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फ़िल्म समीक्षा- “शिकारा”

कश्मीरी हिंदुओं के दर्द को दिखाती हुई बेहतरीन फ़िल्म, सोचने पर मजबूर कर देगी यह फिल्म….
|| पण्डित दयानन्द शास्त्री

कलाकार: आदिल खान, सादिया, प्रियांशु चटर्जी,

निर्देशक: विधु विनोद चोपड़ा..

पटकथा, कहानी और स्क्रीन प्ले लेखक:– राहुल पंडिता, अभिजात जोशी, विधु विनोद चोपड़ा..

रेटिंग – 4 स्टार/5..

शैली – ऐतिहासिक-ड्रामा…

संगीत — ए आर रहमान, संदेश शांडिल्य..


फिल्म ‘शिकारा’ आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। अगर फिल्म की बात करें तो ऐसी फिल्में बॉलीवुड में कम ही बनती है, जिसे देखने के बाद आपकी आत्मा तृप्त हो जाती है। यह फिल्में आपको सोचने पर मजबूर करती है, आपकी आत्मा को झकझोर देती है। साथ ही आपके सारे इमोशंस को पूरी ईमानदारी के साथ फिल्म की यात्रा में शामिल करती है और आप बेझिझक उन किरदारों की दुनिया में शामिल हो जाते हैं। फिर उनका दुख, उनकी तकलीफ, उनका सुख, उनका प्यार, सब कुछ आपका अपना हो जाता है। आप जब फिल्म के बाहर निकलते हैं तो फिल्म आपकी आत्मा में बसी रहती है। फिल्म शिकारा एक ऐसी ही फिल्म है।

अनुच्छेद 370 (Article 370) संशोधित करने के बाद कश्मीर में शूट हुई पहली फिल्म ‘कश्मीर द फाइनल रेजलुशन’ शांति की जगाती है। इस फिल्म के लेखक-निर्देशक और अभिनेता युवराज कुमार को उम्मीद है कि उनकी इस फिल्म को घाटी के लोग भी देखेंगे और पसंद करेंगे।

आज से करीब 30 साल पहले, 19 जनवरी 1990 को हजारों कश्मीरी पंडितों को आतंक का शिकार होकर अपना घर छोड़ना पड़ा था। उन्हें उम्मीद थी कि वे जल्दी ही अपने घरों में दुबारा से उसी तरह रह पाएंगे, जैसे दशकों से रहते आए थे। उन्हें उम्मीद थी कि उनके लिए संसद में शोर मचेगा, लेकिन उनके पक्ष में कहीं से कोई आवाज नहीं उठी। तब से लेकर अब तक 30 साल बीत गए, आज भी वे अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं। कई कश्मीरी पंडित अपने घर में फिर से रहने की आस अपने सीने में दबाए दुनिया से विदा भी हो गए।

फिल्म ‘शिकारा: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीरी पंडित’ की कहानी शिव कुमार धर (आदिल खान ) और उनकी पत्नी शांति धर (सादिया खान) के इर्द गिर्द घूमती है. दोनों ही लोगों को कश्मीर में खुशहाल शादीशुदा जिंदगी जीते हुए दिखाया गया है। यह जोड़ा बड़े ही अरमानों से अपना घर बनाता है और उसका नाम शिकारा रखता है. क्योंकि फिल्म में 89-90 का दौर दिखाया गया है इसलिए पर्दे पर बढ़ती हुई सांप्रदायिक हिंसा के बीच कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर जाने के लिए धमकाते हुए दिखाया जा रहा है।

‘शिकारा’ में 1990 की घाटी से कश्मीरी पंडितों की अनकही कहानी को उजागर किया गया है जिसे जगती और अन्य शिविरों के 40,000 असली प्रवासियों के साथ शूट किया गया है. यहीं नहीं, फिल्म में माइग्रेशन की वास्तविक फुटेज भी शामिल की गई है. विधु विनोद चोपड़ा की फ़िल्म “शिकारा” ने आज सिनेमाघरों में दस्तक दे दी है. फिल्‍म में आदिल खान और सादिया ने मुख्‍य भूमिका निभाई है. फॉक्स स्टार स्टूडियोज द्वारा प्रस्तुत, यह फ़िल्म विनोद चोपड़ा प्रोडक्शंस द्वारा निर्मित और फॉक्स स्टार स्टूडियो द्वारा सह-निर्मित है.

फिल्म में उन परिस्थितियों को दिखाया गया है, जिनका सामना 90 के दशक में घाटी के कश्मीरी पंडितों को करना पड़ा और वो अपना घर छोड़ने पर मजबूर हुए। फिल्म में शिव और शांति भी अपना घर छोड़ते हैं और रिफ्यूजी की तरह जीवन जीने पर मजबूर होते हैं. फिल्म में जहां मुश्किल हालात और जान का खतरा है तो वहीं ये भी दिखाया गया है कि कैसे इन मुश्किल हालातों में शिव और शांति का प्यार नई ऊंचाइयों को हासिल करता है.

अपनी एक्टिंग के जरिये आदिल और सादिया दोनों ही निर्देशक की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं. उन्होंने भी अपने रोल के साथ पूरा इंसाफ किया. किसी फिल्म की कहानी तभी दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींच सकती है जब उसपर निर्देशक ने मेहनत की हो. इस पैमाने पर अगर हम फिल्म शिकारा को रखें तो मिलता है कि इस फिल्म को बनाना विधु के लिए बिलकुल भी आसान नहीं रहा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि फिल्म में जहां एक तरफ लव स्टोरी थी तो वहीं सांप्रदायिक हिंसा को भी इसमें रखा गया।

कहानी की साल 1989 की है और इस वक्त कश्मीर की खूबसूरत वादियों में आतंकवाद पैर फैला रहा होता है। इसी दौरान लाखों कश्मीरी पंडितों को घाटी से बाहर किया जाता है, इसमें शिव और शांति भी शामिल हैं, जिन्हें अपना आशियाना छोड़कर रिफ्यूजी कैंप में जाना पड़ा।

इस दौरान उन्होंने किस तरह तमाम दर्द और पीड़ा झेलते हुए खूबसूरती से जिया..यही कहानी है फिल्म शिकारा की।

निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने जिस तरह से अपनों से बिछड़ने के दर्द और अपने बसे बसाए आशियाने छोड़ने की पीड़ा और एक प्रेम की दास्तां को सुनहरे पर्दे पर रंगा है। ऐसा लगता है कि जैसे ये सब आप के ही साथ हो रहा हो।

इस फिल्म की महानता यही है कि कहानी के चरित्र भी धार्मिक उद्वेग का शिकार हैं, मगर फिल्म के अंत तक मानवीय संवेदनाएं सबसे प्रमुख हो जाती है। निश्चित ही…

इसके लिए विधु विनोद चोपड़ा बधाई के हकदार हैं। फिल्म भले ही कश्मीर की कहानी कहती हो, लेकिन इसका असर सार्वभौमिक है। अगर अभिनय की बात करें तो आदिल और सादिया दोनों ही अपनी लॉन्चिंग फिल्म के साथ जाने अनजाने ही सही अभिनय की उस अवस्था पर पहुंच गए हैं, जहां पहुंचना सभी के बस की बात नहीं होती।

हो सकता है उनकी आने वाली फिल्मों में शायद यह उत्कृष्टता देखने को ना मिले। हालांकि, शिव और शक्ति के किरदार में उन्होंने जो किया है, उसकी तलाश उन्हें जिंदगी भर रहेगी। प्रोडक्शन डिजाइन इतनी खूबसूरती से किया गया है कि उसकी जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है। रंगराजन राम भदरण का कैमरा वर्क फिल्म को एक अलग ऊंचाइयों पर ले जाता है। फिल्म का संगीत और फिल्म के गीत अपना मजबूत असर छोड़ते हैं।

कुल मिलाकर यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि एक लंबे अरसे के बाद बॉलीवुड ने सही मायने में एक ऐसा सिनेमा गढ़ा है, जो विश्व सिनेमा की श्रेणी का है। यह फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए और सपरिवार देखना चाहिए ताकि बच्चों पर इंसानियत के संस्कार पड़े। आप अपने इतिहास से रूबरू हो सके भले ही वह कितना ही काला क्यों ना हो।

अपनो को खोने का दुःख दर्द क्या होता हैं,  यह बात यह फ़िल्म बखूबी दर्शाती हैं।

नई पीढ़ी को यह फ़िल्म जरूर देखनी चाहिए।

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