विचार सोशल

मीडिया की भूमिका

मीडिया की हमारी जिन्दगी में हमेशा सा बड़ा प्रभावशील भूमिका रही है. एक समय था जब मिडिया सिर्फ दूरदर्शन और कुछ समाचार पत्रों तक ही सीमित था, मगर अब आधुनिकरण के चलते इसका रूप विकराल हो गया है. अब गावं, देहात भी इससे वंचित नही हैं. देश डीजिटल भारत बनने की ओर अग्रसर है. सरकार भी इस दिशा में कार्यरत है.
केशी गुप्ता

आधुनिक समय में आन लाईन मिडिया नेटवर्किंग का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है. जो बात कभी पेपर में छप कर बाहर आवाम तक पहुचनें में समय लेती थी, आज कुछ ही समय में इंटर नेट के माध्यम से देश-विदेश में फैल जाती है. लागत भी कुछ खास नही होती और प्रभाव बहुत अधिक. वक्त की भी कोई पाबंदी नही होती, आप किसी जगह से भी किसी समय पर अपनी बात किसी तक भी पहुचा सकते है. हर वर्ग के लोग आन लाइन नेटवर्किंग का हिस्सा है.  हर चीज आप आन लाइन प्राप्त कर सकते हैं. चाहे वह खाना हो, कपड़ा या उपयोग में आने वाली कोई भी वस्तु. आन लाईन नेटवर्किंग नें बाजारों को बहुत अधिक प्रभावित किया है. सस्ता माल आन लाईन उपलब्ध होने, समय की बचत, आने जाने की परेशानी से बचाव के कारण बाजारों का मुनाफा कम हो गया है. ये कहना कतई गलत नही होगा कि इस नई व्यवस्था ने रोजगार के सभी पहलुओ को प्रभावित किया है. दूसरी तरफ युवा पीड़ी के लिए कई नए रास्ते भी खोल दिए है.

आज बच्चा बच्चा इसका उपयोग करना जानता है. गूगल जैसी वेब साईट की उपल्बधता के कारण हर व्यक्ति, बच्चा हर तरह की जानकारी रखता है, तथा तर्क संगत बाते करने में सक्षम है.  देश, विदेश की जानकारी रखना आसान हो गया है. हर आदमी आधुनिक  नेटवर्किंग के लपेटे में हैं, जो आधुनिक समय की मांग है.

मीडिया ने आम आदमी के जीवन को पूरी तरह प्रभावित कर रखा है,  पर वह अपने कार्य में ईमानदार नही हैं. आज मीडिया  बिकाऊ हो चला है. पत्रकारिता और समाचार के मायने बदल गए है. आज मीडिया के सभी माध्यमों के लिए  खबर का महत्व मात्र इतना है कि वह आपको कितना मुनाफा देती है, आवाम को सरकार और देश में होने वाली गतिविधियों को सच्चाई और सबूतो के आधार पर सूचना देना नही रहा. एक ही खबर को मसाले की तरह सभी जगह दर्शाया जाता है. अभिव्यक्ति के लिए किसी भी तरह की भाषा, लफ्जों का प्रयोग किया जाता है जिसने मीडिया के स्तर को बहुत निम्न कर दिया है. समय रहते इस पर विचार करने और सुधार की आवश्यकता है, वरना मीडिया से आवाम का भरोसा पूरी तरह खत्म हो जाएगा.

चलचित्र,फिल्मों और अन्य सभी कार्यक्रमों का स्तर जहां टेक्नोलजी के लिहाज से बेहतर हुआ है, वहीं दूसरी और स्वत्रंता के आड़ में भाषा और चरित्र चित्रण का स्तर बहेद गिर गया है. अश्लिलता और अनैतिक दृश्यों  का प्रदशन आम हो गया है.  ऐसा नही है की कुछ अच्छा नही बनता, जागरूक निर्देशक आधुनिक टेक्नालिजी का सामाजिक उत्थान के लिए, सामाजिक समस्यों के विषय पर चलचित्र बना, अपनी आवाज करोड़ो लोगो तक पहुंचा रहे है. जिस के चलते आम आदमी अधिक जागरूक भी हो गया है. विषय एक ही होता है, मगर उसका  असर पड़ने वाले और देखने वाले हर व्यक्ति पर अलग अलग होता है. क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की मानसिकता सोच अलग हेती है. दूसरी तरफ मिडिया में कार्यरत लोगो का कहना की वह वही दिखाते और छापते हैं, जो आवाम सुनना, पड़ना और देखना चाहती हैं. उनका तर्क ये भी है कि चलचित्र की कहानियाँ और उनका चरित्र आम आदमी के जीवन से ही प्रेरित होते हैं. इस तर्क को यदि सही माना जाए तो यह अधिक चिन्ता का विषय है कि समाज, हम लोग किस पतन की और बड़ रहे हैं. अपने दायित्व को समझना होगा, बजाए इसके कि हर गलत बात के लिए मिडिया को जिम्मेदार ठहराया जाए.

मीडिया जरिया है विचारो की अभिव्यक्ति का, जो इतना सक्षत है कि किसी भी समाज के मू़्ल्यो और विचारधारा को बदल क्रांति ला सकता है. सरकार पर दबाव बना सकता है, न्याय और सही कार्यों के लिए, पर शर्त सिर्फ  ये है कि आवाम और मिडिया को अपनी अपनी जिम्मेवारी समझनी होगी,  तथाकित मूल्यों का ध्यान रखना होगा.

 

केशी गुप्ता | लेखिका एवं समाज सेविका

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