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भारत के स्वास्थ्य व्यवस्था का खराब होता स्वास्थ

बिहार में एंसेफ्लाइटिस, मध्य प्रदेश में कुपोषण, देश में बदहाल स्वास्थ्य स्थिति, अब तक तो स्वास्थ्य अपातकाल लग जाना चाहिए था
प्रतिक वाघमारे

अगर विदेश के किसी देश में 150 से ज़्यादा बच्चे मर जाए, कुपोषण से हर दिन 90 बच्चे मरने लग जाए या फिर प्रदूषण भी लोगों की मृत्यु का मुख्य कारण बनने लगे तो वहाँ अब तक स्वास्थ्य आपातकाल लग जाता। ऐसी स्थिति जिसमें सरकार सारे काम छोड़कर इस स्थिति से लड़ने में जुट गई हो।

लेकिन यहाँ आपातकाल तो दूर फलाना मंत्री क्रिकेट का स्कोर पूछ रहा है तो दूसरा फलाना मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस में झपकी ले रहा है। आप भी ए.सी. में गर्मी से बचने के लिए झपकी लीजिए और बड़े से एल.सी.डी पर क्रिकेट का मज़ा लीजिए क्योंकि नीति आयोग की स्वास्थ्य सूचकांक रिपोर्ट से आपको शायद ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ेगा।

नीति आयोग ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा विश्वबैंक के तकनीकी सहयोग के साथ मिलकर एक रिपोर्ट तैयार की है ताकी राज्यों को इस सूचकांक से स्वास्थ्य स्थिति पर संकेत दिए जा सके। रपट बताती है कि बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश की स्थिति पहले से भी बदतर हो गई है और पिछले साल भी इन राज्यों की यही स्थिति थी। 12 राज्यों में लड़को के अनुपात में लड़कियों की संख्या में भी कमी आई है इस रपट के आने के बाद कई अख़बारों को विशेषज्ञों ने बताया कि डॉक्टर्स और नर्सेस के खाली पड़े पदों को भरे जाने की आवश्यकता है। इसके अलावा इन्हें अच्छी तनख़्वा देने की माँग भी है और हमें मेडिकल उपकरणों, दवाईयों की आपूर्ती के साथ चिकित्सालय के इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी ध्यान देना चाहिए, कुल मिलाकर हमें जीडीपी के 1.5 फीसद खर्च को और बढ़ाने की आवश्यकता है। एक मुद्दा और है- डॉक्टर्स की सुरक्षा का, सरकार को ऐसी नीति तैयार करनी चाहिए ताकी डॉक्टर्स सुरक्षित महसूस कर सकें।

Image Courtesy: The Hindu

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में अभी एंसेफ्लाइटिस नामक यमराज ने दस्तक दिया जो 150 से भी ज़्यादा बच्चों की मौत का कारण बना। यह बहुत ही बड़ी घटना है वहाँ पर बच्चों के लिए बिस्तर की कमी थी, डॉक्टर्स की कमी थी और प्रतिक्षालय की भी कोई व्यवस्था नहीं थी। यहाँ हर साल सैकड़ों बच्चों का मौत का आंकड़ा आता रहता है लेकिन सरकार है कि सुध लेने को तैयार नहीं, वहाँ हर साल बच्चे मरते है, केंद्र और राज्य के आला मंत्री चक्कर लगाने भी आते है, सरकार बदलकर फिर नीतिश कुमार के हाथ आती है और सैंकड़ों बच्चे फिर मर जाते है। इस बार भी यही सब हुआ और इसके साथ सरकार ने बड़ी-बड़ी घोषणाएँ भी कर दी। जैसे मुज़फ़्फ़रपुर के अस्पताल को एम्स की तर्ज पर बनाए जाने की घोषणा, 2500 बेड लगवाने का ऐलान। कुछ कुछ सैंकड़ों बेड्ज़ की ज़रुरत तो बेगुसराय और आस-पास के गाँवों/कस्बों में भी थी, लेकिन नीतिश सरकार के पक्ष में अख़बारों में हेडलाइन बड़ी दिखनी चाहिए इस चक्कर में ये ऐलान हो गया अब अगले साल तक के लिए छुटकारा मिल गया।

मुज़फ़्फ़रपुर के उस अस्पताल की तस्वीरें भावुक कर देती है और सरकार की तमाम बड़ी योजनाओं की पोल भी खोल देती है। एक रपट ने बताया की मध्य प्रदेश में कुपोषण से दो साल में 52 हज़ार बच्चों की मौत हो गई, कारण है सार्वजनिक वितरण प्रणाली(पीडीएस) से मिलने वाले अनाज में दाल न मिलने का। क्योंकि दाल ही एक मात्र ऐसा अनाज है जो प्रटीन देता है लेकिन लोगों तक यह नहीं पहुँच पा रहा, सरकारी आंकड़ों ने ही बताया कि 32 फीसदी बच्चों तक पोषाहार नहीं पहुँच पाता।

Image Courtesy: The Wire

बिहार और मध्य प्रदेश दोनो जगह की समस्या में कुछ कारण मुख्य रूप से एक ही है, जैसे बच्चों तक पोषाहार न पहुँचना, आँगनवाड़ी द्वारा दिए जाने वाले आहार की भी यह समस्या पोल खोलती है, अगर इतने बच्चे पीड़ित है तो कही न कही यह योजना फ़ेल है साथ ही मिड-डे मील की योजना भी। योजनाएँ तो बन जाती है, तारीफ़े भी बटोर लेती है, योजना को जांचने के लिए कमीटी भी तैयार कर ली जाती है लेकिन परिणाम में बच्चों की मौत का आंकड़ा इस योजना को फ़ेल बताने सामने आ जाता है। वही डॉक्टर्स और नर्सेस की कमी भी एक बड़ा कारण है।

आप कहेंगे इतना सब नेगेटिव क्या कुछ पॉज़िटिव नहीं हो रहा? तो हाँ बिलकुल, हो रहा है स्वास्थ्य सूचकांक की रपट बताती है कि राजस्थान, झारखंड, हरियाणा में स्थिति सुधरी है आँध्र प्रदेश और केरल टॉप पर है, दिल्ली का स्थान पाँचवें नंबर पर है लेकिन बिहार में 150 से ज़्यादा, मध्य प्रदेश में 52 हज़ार और प्रदूषण से एक साल में 12 लाख लोगों की मौत का आंकड़ा इस पॉज़िटिविटी पर पानी फेर देता है।

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