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पानी के दोहन से शुरु हुआ मौत का COUNT DOWN

टप…टप…टप… पानी की बुंदों की ये मधुर आवाज कानों में पड़ते ही कितना सुकून देती है लेकिन… ऊंचै पानी ना टिकै, नीचै ही ठहराय, नीचा होय सो भरि पिवै, ऊंचा प्यासा जाए.
जल, नीर, पानी, WATER और भी ना जाने कितने ही नामों से इसे पुकारा जाता है लेकिन जरा सोचिए आखिर कब तक इस टप..टप की आवाज को आप सुन पाएंगे.

|| तरुण कुमार

चेतावनी

टप टप बरसा पानी.. पानी में आग लगाई… रुक जाईये अब कोई पानी में आग नहीं लगा पाएगा. ऐसा इसलिए क्योंकि वह दिन दूर नहीं जब पानी बचेगा ही नहीं या यूं कहिए पानी अपनी जिदंगी के अतिम पड़ाव पर है. पानी को लेकर होने वाली परेशानियां हमारे सामने खड़ी हुई है, ना बल्कि खड़ी हुई है अब तो इससे जूझ भी रहे हैं. आलम यह है कि पानी के लिए लड़ाई भी होती है.

अनदेखी का आलम

जल ही जीवन है, जल है तो कल है, जल बचाओ कल बचाओ, स्वच्छ पानी बेहतर स्वास्थ्य ना जाने कितने ही सैकड़ों स्लोगन चारों ओर तैरते हुए दिखाई देते हैं. लेकिन यह सभी स्लोगन आज केवल पोस्टर में, सोशल मीडिया के मंच पर या फिर दीवारों पर लिखे बाबा फकीर के विज्ञापनों के साइड में कहीं छोटे से कौने से झांक रहे होते हैं.

सेक्स समस्याएं और पहले प्यार को पाने के लिए लगाए गए विज्ञापन को जितनी उत्तेजना और उम्मीद के साथ देखते हैं, उन्हें देखने से ही पता चलता है कि मन में कितनी उम्मीदें अभी भी बाकि है. लेकिन जब बात पानी की होती है तो….

गहराता संकट… सोते हुए हम

आज मैं आपको उस स्थिति से रूबरू कराने जा रहा हूं जिसकी पहले केवल बातें हुआ करती थी लेकिन आज वह वही बातें सच होती नजर आ रही हैं. इस साल यानी 2020 में देश के 21 प्रमुख शहरों में जमीन के नीचे का पानी खत्म हो जाएगा. नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए इस गंभीर संकट को लेकर 2018 में ही चेताया था.

ग्लोबल रिपोर्ट में मुताबिक भारत उन देशों की श्रेणी में है जहां जल संकट सबसे अधिक है. ऐसे 17 देश हैं जो पानी के गरहे संकट में हैं. जारी की गई रिपोर्ट में 189 देशों को शामिल किया गया है जिसमें भारत 13वें स्थान पर है. देश के हाल ऐसे हैं कि दिल्ली, चेन्नई, गुरुग्राम, अमृतसर, जालंधर, पटियाला, मोहाली, लुधियाना यमुना नगर, गाजियाबाद, आगरा, जयपुर, रतलाम, इंदौर, गांधीनगर, अजमेर, जोधपुर, बेंगलुरु, हैदराबाद  और बिकानेर जैसे शहरों में या तो जमीन के नीचे का जल खत्म हो चुका है या फिर खत्म होने को है.

आंकड़ों पर फिरता “पानी”

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया था कि 2030 तक देश में पानी की मांग दोगुनी हो जाएगी. जबकि 2050 तक स्थिति और भी बदतर हो जाएगी. रिपोर्ट पर गौर किया जाए तो देश की जल आपूर्ति 40 प्रतिशत जमीन के नीचे के पानी पर आश्रित है. मोदी सरकार द्वारा  2024 तक हर ग्रामीण परिवार को नल का पानी (जल संसाधन प्रबंधन के तहत) पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन आलम यह है कि मुश्किल से 18 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को इसका लाभ मिल सका है.

2012-17 तक इस योजना पर सरकार द्वारा 81,168 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे इसके बावजूद भी आधा लक्ष्य भी हासिल नहीं कर पाई. आजादी के बाद से ग्रामीण भारत को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न योजनाओं के तहत 2.4 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए. लेकिन उसके बाद भी 80 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवारों के घर में नल का कनेक्शन नहीं है.

सबसे आगे हम…पानी होता कम

आज जहां एक ओर देश के कई इलाके भारी बारिश का प्रकोप झेल रहे हैं वहीं दूसरी ओर देश के कई इलाकों में विकराल सूखे की समस्या लोगों की जान लेने पर आतुर है. इतना ही नहीं 2030 तक देश की 40 प्रतिशत आबादी को पीने का साफ पानी तक नहीं मिलेगा और 2050 तक आते आते जल संकट इतना गहरा जाएगा की देश की जीडीपी को 6 प्रतिशत का भारी नुकसान भी हो सकता है.

आज देश में पानी का 90 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई के काम में लाया जाता है. देश में जल प्रबंधन को लेकर किसी योजना पर गंभीर रुप से काम करना है तो सबसे पहले खेती में इस्तेमाल होने वाले पानी के प्रबंधन पर गौर करना होगा. दुनिया भर में भारत में सबसे ज्यादा भूगर्भ जल सिंचाई के लिए निकाला जाता है. चीन और अमेरिका जैसे देश हमसे पीछे हैं. पिछले कई सालों में भारत ने सिंचाई के लिए पानी के स्रोतों में कई बदलाव देखे हैं. आलम यह है कि सिंचाई योग्य ज़मीन में नहर से सिंचाई वाले इलाक़े की हिस्सेदारी तेजी से घटी है.

हालात यह है कि भूगर्भ जल से सिंचाई की जाने वाली ज़मीन की हिस्सेदारी बढ़ कर कुल ज़मीन के आधे हिस्से से भी ज़्यादा हो गई है. देश के उत्तरी-पश्चिमी इलाक़ों में लगातार भू-गर्भ जल संसाधन का दुरुप्रयोग देश में जल संकट का सबसे बड़े कारणों में से एक है. एक किलो चावल को उगाने में 3500 लीटर पानी लगता है इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश के अन्य राज्यों में किस हद तक पानी की जरूत है जहां फैसले उगाई जाती है.

डूबती योजनाएं

केंद्रीय जल आयोग ने अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए इस बात से आगाह किया था कि पानी की सप्लाई के दूसरे स्रोत भी तेजी से सूख रहे हैं. हालत यह हो गई है कि देश के करीब दो-तिहाई जलाशयों में पानी सामान्य जल स्तर से नीचे जा चुका है. राष्ट्रीय स्तर पर 91 बेसिन और जलाशयों में अब इतना पानी भी नहीं बचा है कि उसे बिजली उत्पादन, खेती या फिर पीने के लिए भी उपयोग में लाया जा सके. तेलंगाना में 36, आंध्र प्रदेश में 83, कर्नाटक में 23, तमिलानडु में 43, और केरल में 38 प्रतिशत जलाशय सामान्य से नीजे जा चुके हैं.

इस पर सरकार का रवैया और सराकारी योजनाएं भी काम करती नजर नहीं आ रही. लेकिन यहां केवल सरकार के ऊपर दोष मढ़ने से कुछ नहीं होगा यह जिम्मेदारी आपकी भी है कि पानी को बचाया जाए. एक दूसरे के ऊपर टालने से कुछ नहीं होगा अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब आपस में ही पानी के लिए लड़ाई लड़ते हुए दिखाई देंगे.

अभी नहीं तो कभी नहीं

अब समय जागरूक करने के साथ-साथ उस पर अमल करने का है अगर अब नहीं तो कभी नहीं. ऐसे बहुत से तरीके है जिनकी बदौलत पानी को बचाया जा सकता है. किस तरह से पानी को बचाना है वह आप भली भांति जानते हैं. आपसे अपील करता हूं कि आप इस स्थिति को अनदेखा ना करें और अपनी समझदारी का परिचय देते हुए आती हुई इस भंयकर स्थिति को पहले ही दूर कर दें. पानी के इस भारी संकट को मौत बनने से पहले या विश्वस्तरीय महायुद्ध में तब्दील होने से पहले अब कदम उठाना होगा. सोचिए नहीं, विचार भी मत कीजिए बस तुरंत शुरू कीजिए…

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