कला साहित्य

समीक्षा: घास में छिपा मातृत्व

झारखंड के युवा कवि राहुल राजेश के प्रथम कविता-संग्रह ‘सिर्फ घास नहीं’ को पढ़ना एक ऐसे इंद्रजाल से होकर गुजरना है, जिसका रचाव वे स्वयं करते हैं और उसमें तब तक गहरे फँसते और धँसते चले जाते हैं जब तक उन्हें यह बोध नहीं होता कि अब उनका दम घुटने लगा है और तब वे उसे नष्ट करने के अभिप्राय से कोई आश्रय या कोई तरकीब ढूंढ़ने का प्रयास करने लगते हैं। कवि का यह इंद्रजाल दुखों का है, जो कविता-संग्रह के आरंभ से अंत तक साथ-साथ चलता है और कभी-कभी तो यह महसूस करने को विवश कर देता है कि वह स्वयं भी दुख से विलग नहीं होना चाहता क्योंकि उसे उस दुख में भी एक प्रकार का सुख मिलने लगा है। कवि के ही शब्दों को दुहराएँ तो, ‘तुम्हारे घर की मुंडेर पर/यह दुख ही बैठा है कौवा बन/जो जता रहा है/आने वाला है कोई सुख/……..क्या इतना सब कुछ/संभव है/दुख के बिना।’ (दुख के बिना)

यहाँ यह विचार किया जा सकता है कि इन कविताओं में परिभाषित दुख कैसा है? क्या वह आत्मपीड़ा से उपजा है या कवि को यह बोध हो चुका है कि जीवन में दुख ही दुख होता है। या फिर वह यह संदेश देना चाहता है कि नकारात्मक चीजों में भी किसी न किसी प्रकार की सकारात्मकता अंतर्निहित होती है, जैसा कि उसकी दो कविताओं-‘असुंदर का सौन्दर्य’ और ‘अच्छे दोस्तों के बारे में’-में स्पष्ट है। दुखों से कवि के लगाव का एक और कारण निम्नलिखित पंक्तियों में उद्घाटित होता है-‘दुख हो साथ/तो सुख की क्रूरताओं से/बचे रह सकते हैं आप’। (दुख का साथ)

किसी भी कवि का रचना-संसार ज्ञानार्जन की प्रक्रिया के साथ विकसित हुई जीवन-दृष्टि और आत्मानुभवों के लय से निर्मित होता है। इस संग्रह में संकलित कुल सत्तर कविताओं में से किसी में भी उसकी सम्यक दृष्टि के बारे में कोई संदेह नहीं होता। जहाँ तक उनके अनुभवों का सवाल है, तो वे मुख्यतः तीन पड़ावों से गुजरते हुए अपनी राह बनाते जान पड़ते हैं-प्रेम, बाजार और आश्रय की खोज (अथवा संघर्ष)।

एक स्थान पर, ‘देवदास और मदर इंडिया जैसी फिल्मों के/न बन पाने का क्षोभ’ (कोई तो हो) प्रकट होता है तो हमें यह पूर्वाभास हो जाता है कि कवि की प्रेम-कविताओं (जो कि संग्रह में ज्यादा संख्या में मौजूद हैं) में एक कन्ट्रास्ट की रचना होने वाली है। जहाँ देवदास का प्रेम एक सूफी कलाम की इन पंक्तियों को प्रमाणित करता है कि

ये बिजली वो है जिस घर पे गिरे खाक करे।

वहीं ‘मदर इंडिया’ दाम्पत्य और पुत्र-प्रेम को एक नया आयाम देते हुए समाज के   लिए आत्माहुति का एक मानक गढ़ता है। इस संग्रह की प्रेम-कविताएँ इन दोनों से हटकर हैं। इन कविताओं में ढेर सारी अपेक्षाएँ की गई हैं। जहाँ एक ओर कवि दुनिया की सबसे सुन्दर स्त्री से प्रेम करते हुए ‘केवल और केवल प्रेम करने की इच्छा प्रकट करता है’ (आज इस तरह), वहीं दूसरी ओर अपने प्रेम को इस प्रकार परिभाषित करता है,

मैं तुमसे इसलिए नहीं प्रेम करता कि/मैं तुम्हारे प्रेम में अंधा हो जाऊँ/बल्कि इसलिए करता हूँ कि/बची रहे मेरी आँखें अंधी होने से/इस बेमुरौब्बत वक्त में’ (प्रेम में इच्छाएँ)।

पता नहीं क्यों मुझे इस कविता को पढ़ते हुए बाल्मीकि के रामायण का वह प्रसंग याद आ गया जब रावण को मारने के बाद राम के आदेश पर सीता को भरी सभा में लाया जाता है और सीता को संबोधित करते हुए राम कहते हैं कि तुम यह समझने की भूल मत करना कि मैंने इतने श्रम एवं प्रयास से रावण को तुम्हारे लिए मारा है। मैंने तो अपने कुल के सम्मान की रक्षा के लिए इतने खतरे उठाए हैं और इसलिए भी कि राम की भार्या का अपहरण किया गया और राम चुप बैठा रह गया, ऐसा कोई नहीं कह पाए।

राहुल राजेश की प्रेम-कविताओं में वर्णित प्रेम का एक खाँचा है जिसे निम्नलिखित पंक्तियों में भी देखा जा सकता है,

थोड़ा बहुत अगर भूल-चूक हो जाए/तो थोड़ा डांटे, थोड़ा माफ करें/कभी हारें-टूटें तो/मन में उल्लास भरें/जितना है कम नहीं/मन में यह आस धरें/… हमारा जीवन बोझ न हो धरती पर/पग-पग ऐसे बढ़ें/चाहता हूँ एक दूजे  को हम ऐसे वरें’। (एक अनाधुनिक प्रणय-निवेदन)। यह अभिव्यक्ति कवि के लिए भले ही अनाधुनिक हो, मुझे तो यह सोच-विचार के बाद किया गया उत्तर आधुनिक प्रेम का आभास देती है। कवि की इस स्वीकृति के बावजूद कि ‘किसी वृद्धा के लिए बस की सीट छोड़ने से लेकर/जरूरत के मुताबिक/रंग-ओ-बयान न बदल पाने तक/कहीं भी न हो सका व्यावहारिक’ (स्वीकारता हूँ मैं), एक दूसरी कविता में उसकी ठेठ व्यावहारिकता (या अस्थिरवृत्ति) प्रकट हो ही जाती है-‘बस याद आईं  तुम और/बरवश भूला तुम्हें/दाल रोटी की चिंताओं में जब कभी चाहा तुम्हें फोन करूँ/बूथ तक जाकर लौट आया/तुम्हारी आवाज से कहीं ज्यादा जरूरी लगे/जेब के दो रुपये (उस तरह तो बिल्कुल नहीं)।

मैंने सुना है, प्रेम (की अलौकिकता) में बाहर से कोई आवाज सुनने की व्यग्रता बिल्कुल ही लुप्त हो जाती है। इसमें आवाजें भीतर से उठती हैं और चैतन्य और मीरा को सैकड़ों वर्ष बाद, एक पैसे खर्च किए बिना ही सुनाई दे जाती हैं। इस कविता-संग्रह की भूमिका में प्रसिद्ध साहित्यकार नंद किशोर आचार्य ने एक स्थान पर लिखा है कि ये कविताएँ ‘दैहिक सौंदर्य के प्रति आकर्षण का अतिक्रमण करती हुई एक विश्वासानुभव अर्थात नैतिक रिश्ते के बोध में तत्त्वांतरित होने की प्रक्रिया अधिक लगती हैं’। मेरा मानना है कि नैतिकता के मानदंड समाज द्वारा निर्मित किए जाते हैं; जबकि प्रेम की नैसर्गिकता असंदिग्ध होती है और इसीलिए दोनेां एक दूसरे के लिए कसौटी का काम नहीं कर सकते। मुझे यह भी महसूस होता है कि शायद इन कविताओं में उपस्थित प्रेम में तमाम अपेक्षाओं और इच्छाओं के बावजूद, इन्हीं अपेक्षाओं और इच्छाओं के कारण प्रेम का परिणाम असंतोष और दुख और अतृप्ति में होता है – (1) ‘प्रेम में हम ऐेसे समय को/जी रहे होते हैं/जो कभी नहीं आता जीवन में’। (2) ‘मैं एक ऐसी औरत को प्यार करता हूँ/जो एक दरख्त है जिसकी छाँह में बैठता हूँ/तो धूप में झुलस झुलस जाता हूँ’ (मैं एक ऐसी औरत से प्यार करता हूँ)।

जाहिर है कि राहुल राजेश की प्रेम कविताओं में मौन पर –

शोर और शर्तें और एक सीमा तक बड़बोलापन भारी पड़ता है। इनमें इस भाव का भी अभाव है कि प्रेम की असफलता में भी सफलता छिपी हो सकती है। इन कविताओं में प्रेम की असफलता पर क्षोभ प्रकट किया गया है और इस असफलता के कारक के रूप में बाजार को चिह्नित किया गया है,-‘तुम्हें कोई हक नहीं/कि प्रेम न हाट बिकाय/का पाठ पढ़ाओ/और खुद हाट-बाजारों में/खड़े हो जाओ’ (तुम्हें कोई हक नहीं)।

वस्तुतः यह बाजारवाद ही है, जिसे इस कविता-संग्रह की लगभग सभी कविताएँ अपना निशाना बनाती हैं और जिस बाजार को ये कविताएँ अपना स्थायी शत्रु मानती हैं, उसकी इन्हें सही पहचान है,

‘एक दिन सात समंदर पार’ से आया एक व्यापारी/और बेच गया हमारे हाथों/गोरा होने की भूख/… एक दिन हम बेच आए अपने दोनों हाथ/और बदले में खरीद लाए/गरीब को और गरीब बनाने की तकनीक/हमारी भाषा में लौटी संवेदना/विज्ञापन की भाषा बनकर एक दिन/एक दिन बच्चों के सपने में/परियाँ गईं मर/…एक दिन अमरीका को छींक आई/एक दिन नासडाक गिरा नाक के बल/धडाम…/कई कई दिनों तक छपती रहीं सुर्खियाँ/कई कई   दिनों तक थरथराया मुंबई का संवेदी सूचकांक (एक दिन)।

इस बाजार में किसान की क्या औकात हो सकती है? उसके श्रम-स्वेद से पैदा किया गया अन्न भी अंततः मंडियों में पहुँचकर भूख-तृप्ति की पवित्र वृत्ति खो देता है और एक सामग्री में रुपांतरित हो जाता है (अन्न)। सबसे बड़ी विडंबना तो एक आदिवासी किसान के साथ होती है,

शहर आए आदिवासी पिता के पाँवों में/जमी पैंतीस मील दूरी की थकन/भूख और बीमारी से अकड़ा हुआ बदन/और बेटे की देह पर वुडलैन्ड के जूते और लिवाइस जींस/की चमक बन इठला रहे/छात्रवृत्ति के पैसे (यह हमारा ही समय है)।

कवि के साथ हम सभी को यह कहने में हिचकिचाहट नहीं कि यह एक कठिन समय है और जिस साहित्य से सबको अपेक्षा होती है उसकी भी भूमिका और चरित्र संदिग्ध हो चुका है। तब क्या चुप बैठे रहना चाहिए? या संघर्ष करना चाहिए? और यदि संघर्ष करना चाहिए तो उसकी राह कैसी होनी चाहिए?

लौटें हम अपनी जड़ों की ओर/तलाशें बिसराए संबंध/जिएँ अपना ही लोक, अपनी माटी/अपनी भाषा/………हमारे पसीने का नमक/जीवन का कर्जदार हो/बाजार का नहीं (प्रार्थना-दो)।

यहाँ यह भी कह देना प्रासंगिक है कि कवि अपने संघर्ष में मनुष्य ही नहीं, ‘मानवेतर अस्तित्व’ (साभार नंद किशोर आचार्य) के साथ भी आत्मीयता स्थापित करता है। मानवेतर अस्तित्वों की इस सूची में घास, परिंदे, पहाड़, नमक, पत्तियाँ, जाड़े की धूप, मैटर्निटी वार्ड और यहाँ तक कि तकिया भी शामिल है। संसार में जो भी लोग या अस्तित्व अपनी उपस्थिति से हमें प्रेरित  करते हैं अथवा सुख पहुँचाते हैं, उनके प्रति आभार कवि के संस्कार में घुला-मिला है और आभार का यह भाव ही इन कविताओं को बाजार के दबाव से बचाता है। बाजार आज से नहीं, मानव सभ्यता के जन्म के समय से रहा है और मनुष्य को दास बनाने का प्रयास बराबर करता रहा है, जबकि साहित्य हमेशा से इस युद्ध में मनुष्य के साथ खड़ा है। प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ इस प्रसंग में बरवश याद आती है, जिसमें हामिद खिलौनों के पैसों  से अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदकर इस बाजार को चुनौती देता है। इस कविता संग्रह में भी कवि कुछ मौलिक विंबों और रुपकों के बहाने बाजार को अपनी औकात समझने की हिदायत देता है।

‘बस मिट्टी की भरपूर मिठास लिए/फुनगी पर थोड़ी सी घास लिए/हवा में झूमती इतराती/मेरी सींक सी काया/मुझ सी मिठास/बाबू दुर्लभ इस बाजार में/सचिन शाहरुख सौरभ/के बूते टिकी हैं ये बोतलें/मैं तो बाबू, टिका हूँ/बस अपने बूते/इस बाजार में’ (गन्ना)।

इस संघर्ष में कवि को लोहे से भी ज्यादा कारगर और टिकाऊ बाँस लगता है-‘लोहे-सा मुझमें/जंग लगता नहीं/लोहे-सा मैं/पिघलता नहीं/लेकिन लोहे से कम नहीं हूँ’ (बाँस)। इसी क्रम में, देखने की बात है, कवि फलों के बीच सेब-संतरों को छोड़ बेर का चुनाव करता है-‘सेब संतरे/आम अंगूर के/बीच बैठूँ इतनी बिसात नहीं/मैं जंगल का बेर हूँ/मेरी कोई जात नहीं/……..कहने को तो मैं/उनका साथी हूँ/लेकिन फलों में आदिवासी हूँ/………रामायण के सिवा/कहीं और/मेरा जिक्र आता नहीं/आज कोई राम शबरी के जूठे बेर खाता नहीं’ (बेर)।

कवि के लिए घास भी केवल घास नहीं होती,-‘कहाँ से लाती इतना गाढ़ा हरापन/किनकी आँखों से चुराया/यह बांकपन/……इनकी मखमली देह पर/रात भर लोटता चाँद/पशुओं के धन से उमगता यह क्षीर/कोई विज्ञान नहीं/इन घासों का मातृत्व’ (सिर्फ घास नहीं)। यहाँ गौरतलब है कि यह घास वह नहीं जो आस्टेªलिया आदि से आयातित होकर बाजार में बिकती है और बंगलों और अपार्टमेन्टों के लाॅनों पर लाखों गैलन पानी की खपत के बाद पलती और कृत्रिम रूप में आकारित की जाती है, बल्कि यह वह घास है जो अपनी जड़ों के बूते कभी नहीं नष्ट होती और तमाम तूफानों और झंझवातों के बाद भी आकाश से बातें करती हैं। यहाँ तक आते-आते यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ममत्व और माँ ही, कवि के लिए, वह परम आश्रय है जहाँ पहुँच कर वह असफलताओं, दुखों और बाजार के आक्रमण से अपने को सुरक्षित महसूस करता है-‘सूरज को माँ ने छिपाकर/रख लिया है पास/ज्यों थोड़ी सी आग’ (रात)।

इस संग्रह में ‘माँ’ शीर्षक से तीन कविताएँ हैं। यह भी बिना कारण नहीं कि संग्रह का आरंभ ‘माँ’ से और समापन ‘नींद’ शीर्षक वाली एक लंबी कविता से होता है जो पूरी तरह माँ को समर्पित कही जा सकती है। कविताओं में माँ घर की नींव है, नींद है, लोरी है और वह भी ऐसी जो ‘जहाँ ठहर जाए वहीं घर/जिसे पुकार दे वही बेटा/जिसे छू ले वही तुलसी/जब जागे तक बिहान/जब पूजे/तब नदी/जब निरखे/तब समुद्र’।

यदि, यह कहा जाय कि माँ से संबंधित कविताओं में कवि की मोहाविष्टता माँ के प्रति – झांकती दिखाई देती है तो अतिशयोक्ति नहीं।

माँ के प्रति कवि का यह भाव उसकी पे्रम कविताओं को भी प्रभावित करता दिखाई देता है ‘जब जब दुखों ने झिंझोड़ा तोड़ा मुझे/तुम्हारी गोद में मुँह ढापकर रोया/माँ कहने की इच्छा में तड़प-तड़प उठा मैं’ (उस तरह तो बिल्कुल नहीं)।

अंततः, जब भीतर गलघोंटू सन्नाटा छाता है, हँसने के अवसर मिलने के बावजूद ‘हर वक्त रोने की नामालूम इच्छा’ होती है, प्रेम जैसे नितांत गाढ़े क्षणों में भी अनचीन्हा खलल पैदा होता है और हर वक्त बुरे सपने दिखाई देते हों (धुंध), तो ऐसे क्षणों में माँ की लोरी ही है जो हजारों किलोमीटर की दूरी से कवि के पास पहुँच थपकियाँ देकर उसे सुला सकती है-‘रोज रात बाइस सौ किलोमीटर दूर से/हवाओं के संग चलकर आती है लोरी/और मुझे सुलाती है/कानों में कहती है/आ रही हूँ सोने पास तेरे/और आँखों में घुलने लगती है नींद’ (नींद), और ऐसी नींद के बाद जो सुबह होती है वह भी उसी आवाज के साथ शुरू होती है जो लोरी लेकर आई थी, ‘एक बार फिर बाइस सौ किलोमीटर दूर से/चलकर आती आवाज छू लेती है/मेरी नीली देह को/उठो सुबह हो गई/मेरे अंदर दिल धड़कता है/और जा टंगता है क्षितिज पर/लाल सूरज बनकर (नींद)।

वरिष्ठ साहित्यकार नंद किशोर आचार्य ने इस पुस्तक की भूमिका में कवि को यह ठीक ही सुझाव दिया है कि उसे ‘अपनी मूल पूंजी शब्दों के अनावश्यक व्यय और एक पड़ाव पर अधिक दुहराव या यह कहें कि संप्रेषण के अतिरिक्त आग्रह से बचना होगा’। यहाँ एक और पहलू का जिक्र प्रासंगिक है कि झारखंड का होने के बावजूद कवि की इन कविताओं में झारखंड लगभग अनुपस्थित है।

फिर भी, राहुल राजेश अपनी कविताओं की इस पहली सुबह के साथ अपनी लंबी और प्रखर काव्य-यात्रा की उम्मीद जगाते हैं।


पुस्तक का नाम: सिर्फ घास नहीं (कविता संग्रह)
कवि: राहुल राजेश
प्रकाशक: साहित्य अकादेमी (नवोदय योजना)
मूल्य: अस्सी रुपए


समीक्षक: नारायण सिंह

60,कुंज विहार कॉलोनी, सुगियाडीह, सरायढेला,धनबाद- मोबाइल: 09430707409 ई-मेलः narainsingh52@ gmail.com

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