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लव जेहाद: आखिर क्यों हो रहा इतना बवाल

भारत विविधताओं का एक देश है। यहां पर धर्म, जाति, लिंग, संप्रदाय की भिन्नता होते हुए भी आपसी भाईचारा और पारस्परिक सौहार्द बना हुआ है। लोग एक दूसरे के सुख दुख का हिस्सा होते है, एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते है और जरूरत पड़ने पर एक दूसरे के लिए खड़े भी होते है। यह सतत प्रक्रिया आज से नहीं अपितु आजादी से पूर्व ही होती चली आ रही है। लेकिन हाल के वर्षों में देखा गया है कि समय के साथ साथ लोगों में सामंजस्य स्थापित करने में काफी मुश्किल आ रही है।

|| अभिनव नारायण झा


हमारा संविधान जहां सभी को समान न्याय और अधिकार प्रदान करता है। सभी को एक आयने में रखने की पूरी कोशिश करता है। लेकिन कहीं न कहीं कुछ ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है जहां पर संविधान के साथ साथ बाकी न्याय व्यवस्था को भी ताक पर रख दिया जाता है। अभी हाल ही में लव जिहाद के बारे में खूब चर्चा हो रही है। लव जिहाद सुनने में आपको थोड़ा अजीब सा लगेगा। और लगे भी क्यों न भला प्यार में ये जेहाद शब्द के क्या मायने? सोचकर बहुत अटपटा सा लग रहा होगा।

जी हां! सही सुना आपने। उत्तरप्रदेश ने इससे संबंधित कड़े कानून बनाए है। इसके लिए उत्तर प्रदेश के सदन ने अध्यादेश लाकर इसे और भी कड़ा बनाने का प्रावधान किया है। इसके साथ साथ मध्यप्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, बिहार और हिमाचल प्रदेश में भी इसे कानून का रूप देने के लिए तैयारी चल रही है। आखिर यह है क्या? जब कोई भी व्यक्ति अपना नाम छुपाकर, धोखे से, ग़लत तरीके से, सोच और मंशा सही नहीं होने के कारण शादी करता और धर्म परिवर्तन होता है तो यह कानून प्रभावी होगा। चीज़ों को समझने की आवश्यकता है। अगर कोई स्वेच्छा से और अपने मन से धर्म परिवर्तन करता है तो उसमें कोई रोकटोक नहीं है। न ही संविधान में और न ही किसी सरकार के द्वारा रोक लगाई गई है।

सबसे गौर करने वाली बात जो है वह यह है कि यह कानून न तो किसी धर्म के खिलाफ है और न ही किसी की भावना को आहत करने के लिए बनाया गया है। अगर कोई व्यक्ति पहले से यह सोच कर चला अा रहा है कि शादी का झूठा झांसा देकर जबरन धर्म परिवर्तन करा लिया जाएगा तो वैसे व्यक्ति की अब ख़ैर नहीं है। आज भी कोई मुसलमान हिन्दू से और कोई हिन्दू मुस्लिम से शादी कर सकता है। बशर्ते वह स्वेच्छा से किया गया विवाह हो तब। यह पहली बार नहीं है जब इस तरह के कानून को देश के राज्यों में लागू किया जा रहा हो। इससे पहले भी आजादी के पूर्व उस समय देश की चार रियासतों राजगढ़, पटना, सरगुजा और उदयपुर में इसको लेकर कानून थे। सबसे पहले 1936 में राजगढ़ में यह कानून बना फिर उसके बाद 1942 में पटना, 1945 में सरगुजा और 1946 में उदयपुर में कानून की स्थापना हुई। इन कानूनों का मकसद हिंदुओं को ईसाइयों में बदलने से रोकना था। धर्म कोई भी क्यों न हो इस तरह का विवाद नया नहीं है।

संविधान की बात करें तो हमारे संविधान में ऐसा कोई भी कानून नहीं है जो धर्म परिवर्तन को रोकता है। संविधान में यह कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन कर सकता है। इसे धार्मिक स्वंत्रता भी कहा जाता है। हालांकि हमारे संविधान में किसी के इच्छा के खिलाफ धर्म परिवर्तन करना और जबरन कोई भी धर्म कबूल करवाया अपराध की श्रेणी में है और यह गुनाह है। साथ ही राज्यों के पास इसके लिए कानून बनाने का भी पूर्ण अधिकार है और राज्य कि तरह से विधानसभा में इस कानून के पास होने के बाद जो सबसे जरूरी बात है वह है राष्ट्रपति की मंजूरी। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद इसे कानून का रूप से दिया जाता है।

साथ ही अगर कोई चाहें तो इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती भी दे सकता है। इसकी मौजूदगी के खिलाफ न्यायालय में याचिका भी दायर कर सकता है। हर राज्यों में कानून का नाम अलग अलग है लेकिन मकसद एक। जबरन धर्म परिवर्तन को रोकना। और यह सही भी है। आपके पास यह अधिकार नहीं कि आप जबरन किसी को धर्म परिवर्तन के लिए विवश और मजबूर करें। अगर कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहता है तो वह खुद कर लेगा किसी को कहने या बोलने की आवश्यकता नहीं है।

भारत में इसे लेकर खूब हंगामा भी हुआ। कुछ लोगों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता के विरूद्ध और धार्मिक भावनाओं का ठेस पहुंचना भी बताया। लेकिन ऐसा कदापि नहीं है। भारत के बाहर भी पड़ोसी देशों में जबरन धर्म परिवर्तन को लेकर कानून पहले से ही है। नेपाल, भूटान, म्यांमार, पाकिस्तान और श्रीलंका में ऐसे कानून बनाए जा चुके है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पाकिस्तान में सबसे ज्यादा मामले धर्म परिवर्तन के आते है और यहां पर जबरन धर्म परिवर्तन के तहत सज़ा उम्रकैद तक है। पाकिस्तान में मुस्लिम आबादी द्वारा समय समय पर इस कानून को रद्द करने की मांग उठती रही है।

भारत जैसे देश में भी अब जबरन धर्म परिवर्तन का मामला तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। हालांकि लोगों को इसके लिए जागरूक करने की भी आवश्यकता है। जबतक लोग जागरूक नहीं होंगे तब तक कोई भी कानून किसी को कुछ नहीं प्रदान कर सकता। लोगों को इसकी समझ होना बेहद जरूरी है। समझदारी से काम लें और जल्दबाजी में विवाह तो बिल्कुल नहीं करें।

उत्तर प्रदेश में स्थित इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसपर टिप्पणी करते हुए कहा है कि “किसी को भी अपने पसंद की व्यक्ति के साथ रहने का पूरा अधिकार है। वह चाहें किसी भी धर्म का क्यों न हो। यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मूल तत्व है।” सबसे बड़ी बात यह है कि यह केस गैर जमानती होगा और जमानत के कोई भी आसार नहीं होंगे। साथ ही शादी करवाते समय मौलाना और पंडित को उसके धर्म का ज्ञान बेहद ही जरूरी होगा। हमारे संविधान में भी अगर स्वतंत्रा की आजादी दी गई है तो उसपर उचित प्रतिबंध भी लगाए गए है। लोगों को इसे भी समझने की आवश्यकता है। स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि आपको जो मन हुआ वो करें। संविधान के दायरे में रहकर और दूसरे की भावना को आहत न कर के साथ ही किसी को अपने क्रिया से चोट नहीं पहुंचकर ही आप आजादी का इस्तेमाल कर सकते है। इसे भी ध्यान रखने कि आवश्यकता है।

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