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कहानी: ….कि तुम मेरी जिन्दगी हो

‘आप सुमन के पापा हो’

‘जी, नहीं’

‘तो’

‘चाचा हूँ’

‘चलिए, चाचा भी तो पापा ही होते हैं।’ डॉक्टर बोला था।

‘मेरे चाचा मेरे लिए पापा हीं है। पापा मैंने नहीं देखे। मेरे चाचा ने मेरे लिए बहुत दुख उठाए। कभी हम सभी भाई बहिनों को पता ही नहीं चलने दिया कि पापा क्या होते हैं, सर। मेरे चाचा बहुत अच्छे हैं।’ सुमन के मन में, मेरे लिए छिपी श्रद्धा और सम्मान साकार होने लगा था।

      डॉक्टर साहब कुछ नहीं बोले थे। उन्होंने सुमन को देखा था। उसकी बातों की सच्चाई को जानना चाहा था। फिर, अल्ट्रासाउण्ड्स, एम आऱ आई आदि की रिपोर्टें देखते रहे थे। मुझे हाथ से, बैठने का संकेत किया था। मैं वहीं उनके सामने ही कुर्सी पर बैठ गया था, ‘आपसे एक जरूरी बात कहनी है।’ डॉक्टर साहब ने मेरी तरफ देखा था। मैंने भी सिर हिलाकर स्वीकृति दे दी थी मानो कहना चाहा था, ‘कहो क्या कहना है, सर।’

      ‘सुमन का केस थोड़ा सा कम्पलीकेटिड है। मेरे लिए, नॉर्मल स्थिति में कुछ भी नहीं है। अब चूँकि सुमन, अनमैरिड है इसलिए हमें फूँक-फूँककर कदम रखना होगा। आपको फेथ में लेकर काम करना जरूरी है।’ वे बताए जा रहे थे।

      ‘आप थोड़ा सा और स्पष्ट करें, सर।’ मैं बोला था।

      ‘ठीक कहा आपने। देखो, सुमन की ओवरी में सिस्ट है। सिस्ट बढ़ रही है। उसे निकालना होगा। निकल भी जाएगी लेकिन बहुत संभव है कि वह कुछ परेशानियाँ छोड़ जाए।’ डॉक्टर साहब आगे बताते इससे पहले मैं बोल पड़ा था, ‘मतलब’।

      ‘मतलब ये कि हो सकता है सुमन शायद कभी माँ न बन पाए। वैसे ऐसा होगा नहीं लेकिन पॉइंट फाईव परसेंट संभावनाएं रहती हैं।’

      इसके आगे भी डॉक्टर साहब न जाने क्या-क्या क्रोनिकल बातें बताते रहे थे। मुझे तो लगा था कि उनका केबिन घूम रहा है। मैं चक्कर खा रहा हूँ। और ध्यान न दिया तो मैं गिर पडूँगा कि मेरे मुँह से निकल गया था, ‘पानी’। डॉक्टर साहब पानी देते इससे पहले ही सुमन ने पानी की बोतल मेरी तरफ बढ़ा दी थी। मैंने आधी बोतल खाली कर दी थी।

      ‘देखिए, सुमन के चाचा। आपको धैर्य से काम लेना होगा। सुमन अभी बच्ची है। आप बड़े हैं और समझदार भी। परिवार के अन्य लोगों को भी साहस देना होगा आपको। मुझसे आज तक कभी कोई चूक हुई तो नहीं है लेकिन फिर भी।’ फिर अपने हाथों को उठाकर बोले थे, ‘हजारों आपरेशन किए हैं मैंने। अब तक तो ऐसा हुआ नहीं।’

      मैं चुप था

      ‘तो ठीक है अगले फ्राईडे को सुमन को लेकर सुबह सात बजे आ जाना। उसी दिन आपरेशन कर लेंगे और अगले दिन छुट्टी मिल जाएगी। विश्वास है सब ठीक रहेगा।’ इतना कहकर डॉक्टर साहब ने हमें इजाजत दे दी थी।

      हम बाहर आ गए थे उनके केबिन से।

      मैं अंदर-अंदर तो परेशान था लेकिन अपनी परेशानी प्रकट नहीं होने दे रहा था। बाहर भाभी और छोटेवाला इंतजार कर रहे थे। ‘क्या कहा डॉक्टर ने।’ भाभी बोली थी।

      ‘कुछ नहीं। फ्राईडे को आपरेशन होगा और सैटरडे को ललिया (बेटी) को छुट्टी मिल जाएगी।’ मैं सहज होने का साहस कर रहा था।

      हम सब घर लौट आए थे।

      अगले फ्राईडे को हम जल्दी ही हॉस्पीटल पहुँच गए थे। डॉक्टर साहब और नर्सें अपने-अपने काम में व्यस्त थे। डॉक्टर साहब ने मुझे देखकर छोटी वाली स्माइल दी थी। मैंने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए थे। शायद कहना चाहा था, ‘मेरे भाई की अमानत है। चूक न होने पाए, सर।’ बेटी को आपरेशन थिएटर ले जाया गया था। भाभी वहीं बाहर वेटिंग रूम में पड़ी बैंचों पर बैठ गई थी। छोटेवाला भी वहीं बैठा था। मैं भी उन्हीं के पास साइड में बैठ गया था। मेरे अलावा, बहुत से और लोग भी बैठे थे।  सभी का कोई न कोई आपरेशन थिएटर में था। कोई-कोई तो ऐसा भी था जो आपरेशन थिएटर के दरवाजे की ओर ही देख रहा था जिधर से उसके अपने को अंदर ले जाया गया था।

      प्रायः लोगों को कहते सुना है कि ‘कोई काऊ को नाहि है’ लेकिन हस्पतालों में ये बात झूठी साबित होती है। अगर कोई किसी का नहीं है तो ये बाहर बैठे लोग कौन है। बीच-बीच में, गार्ड या वार्डबॉय आकर किसी के नाम की आवाज लगा जाते।  शर्मिला के साथ कौन है या फिर रजिया के साथ वाले आओ। जिससे लोगों का ध्यान बंट जाता था। अधिकांश के चेहरे उतरे हुए थे।

      मैं बैंच पर बैठा सभी को देख रहा था। भाभी और छोटेवाला कुछ बातें करने लगे थे कि… कि…

      ……..कैसे भैया अपने छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर भगवान के घर चले गए थे। भाभी के चार बच्चे हैं। दो बेटे और दो बेटियाँ। जब भैया की मृत्यु हुई थी तब भाभी खूब जवान थी। चार बच्चे जल्दी-जल्दी हो गए थे। भैया बहुत ज्यादा काम नहीं कर पाते थे। उन्हें टी. बी. हो गई थी। तब टी. बी. लाइलाज हुआ करती थी।जिसे होती उसका जाना तय होता था। भैया की मृत्यु पर अम्मा और घर के शेष लोगों ने भाभी को ही कोसा था। ‘इसी की वजह से मेरा बेटा चला गया। खसम के बगैर कभी सोती तो थी नहीं। कमजोर शरीर था मेरे बेटे का। ये जवान लुगाई। लील लिया मेरे बच्चे को।’ भाभी का साथ देने के बजाय, उन्हें दुत्कार और घृणा ही मिली थी। मेरा झुकाव भैया की ओर था। भाभी भी मेरे लिए महत्वपूर्ण रही। उस समय सुमन अपनी मम्मी का दूध पीती थी जब भैया अपनी अंतिम यात्रा पर निकल गए थे। बड़ा बेटा ही थोड़ा सा समझदार था। उसी ने घर संभाला था। मैंने साथ दिया भाभी और बच्चों का जिसका परिणाम य़े निकला कि मुझे भाभी के साथ जोड़ा गया। ’एक को तो लील गई अब इसे भी लील लेना।’ भाभी सूनी-सूनी आँखों से सभी को देखती रहती।  स्थिति तो यहां तक आयी कि मेरी पत्नी भी मुझे गलत समझने लगी थी। खैर, आप जब भी कोई अच्छा काम करेंगे, बाधाएं आपका मार्ग रोककर खड़ी हो जाएंगी। मैं अपवाद कहाँ था।

      बड़े बेटे की मेहनत, लगन और परिवार के प्रति निष्ठा, भाभी की ईमानदारी और मेरा साथ, आज भाभी के चारों बच्चे समर्थ हैं। जो भाभी एक-एक पैसे के लिए तरसती थी आज उसको, उसके दोनों बेटों ने अपने अपने क्रेडिट कार्ड दे दिए हैं। बड़ी बेटी का ब्याह कर दिया है। बेटे भी ब्याह दिए हैं। बस सुमन ही बची है। सुमन भी भारत सरकार में सैक्शन आफिसर है, वस्त्र मंत्रालय में। किसी तरह का कोई दुख नहीं है भाभी के लिए। हां भैया को वापिस तो भगवान भी नहीं ला सकते। वह दुख तो रहेगा ही। रही बात मेरी, तो मेरा क्या है। कभी वादा किया था भाई से कि जीवन की आखिरी सांस तक बच्चों को आपकी कमी महसूस नहीं होने दूँगा। वही पूरा कर रहा हूँ. अब ये बात और है कि…..।

      सोच ही रहा था कि वार्डबॉय ने आवाज लगाई थी, ‘सुषमा के साथ कौन है।’  ‘मैं’, न जाने कब बोल गया था मैं। भाभी ने मुझे देखा था, ‘क्या हुआ, सब ठीक तो है। वह सुषमा को बुला रहा है। सुमन को नहीं।’ फिर पानी की बोतल मेरी ओर बढ़ाई थी, ‘लो पानी पियो। आप ऐसे करोगे तो हम…हम कैसे करें।’

      ‘अरे, वो, बस ऐसे ही।‘ मैंने कह दिया था। उन्हें नहीं बताया था कि भाभी, मैं मीलों दूर चलकर लौट आया हूँ।

      सब पेशेंट के नाम बुलाए जाते लेकिन मेरी सुमन का नाम नहीं बुलाया जा रहा था। देखते-देखते पौने चार बजने को आए। हम सब की आँखें आपरेशन थिएटर के दरवाजे की ओर लगी थीं और कान खड़े थे।

      फिर वार्डबॉय ने आवाज लगाई, ‘सुमन के साथ कौन है।’ मैं एक ही पल में उसके सामने। भाभी और छोटेवाला तो सामान ही संभालते रहे थे।

      ‘अरे आपकी जरूरत नहीं है। कोई लेडी भेजो।’ वार्डबॉय गुर्राया था।

      ‘क्यों।’

      ‘अरे, भाई गाईनी का मामला है। आप वहाँ क्या करेंगे।’ और उसने मुझे ऐसे दुत्कारा था मानो मैं कुत्ता होऊँ।

            तब तक भाभी भी आ गई थी। भाभी वार्डबॉय के साथ अंदर चली गई थी।  कुछ देर बाद सुमन को वार्ड में शिफ्ट किया जाना था। दो महिला कर्मचारी उसे स्ट्रेचर पर लिए वार्ड में जा रही थीं। वार्ड, आपरेशन थिएटर से थोड़ा सा दूर था। मैं भी स्ट्रैचर के साथ साथ ही चलने लगा था। रंभा, उर्वशी, कामायनी को मात देने वाली मेरी सुमन का चेहरा पीला पड़ा हुआ था। होंठ पपड़ाए हुए थे। शेष शरीर ढका था। मैं रोक न सका था, ‘बाबू, बाबू, सुमन, ए सुमना….मैं चाचा….मुझे देखो, बाबू।’  सुमन ने थोड़ी सी आँखें खोली थी फिर बंद कर ली थीं।

       सुमन को वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था।  भाभी उसकी देख रेख के लिए थी। मैं और छोटेवाला वार्ड के बाहर ही खड़े थे। अभी बहुत ज्यादा देर भी नहीं हुई थी कि भाभी, वार्ड के बाहर आयी और बोली थी, ‘डॉक्टर साहब बुला रहे हैं।’, मैं यंत्रचलित सा उनके सामने था।

        ‘आपकी बेटी का आपरेशन सक्सेस रहा। वह खतरे से पूरी तरह बाहर है, लेकिन…’ इसके पहले कि डॉक्टर कुछ आगे बोलता मैं बीच में कूद पड़ा था, ‘लेकिन माने क्या डॉक्टर साहब।’

      ‘लेकिन माने ये कि अब सुमन कभी मां नहीं बन पाएगी। मैंने बहुत कोशिश की लेकिन क्या करता, सिस्ट ने जड़ें पक़ड़ ली थी। बेटी को बचाना बहुत जरूरी था हमारे लिए पेशेंट इज इसेंशियल। बच्चे पैदा करने की तो तमाम टेक्नीक हैं मार्केट में। लेकिन इंसान को बचाने की….नो…नो वन। आई डिड राईट, य़ू डोंट वरी। सुमन को मत बताइएगा और यहाँ तक कि उसकी माँ को भी नहीं। ये बात सिर्फ मैं जानता हूँ या फिर आप। सुमन की माँ औरत ही है। और फिर ये क्रूयल समाज। आई थिंक यू बेटर अण्डरस्टैण्ड।’ और मेरी कोई बात सुने बिना ही बाहर चले गए थे डॉक्टर साहब।  उनके जाते ही महिला कर्मचारियों ने मुझे बाहर जाने के लिए कहा था। मैं वार्ड से बाहर आ गया था। भाभी, सुमन के पास चली गई थी। मैं और छोटेवाला वहीं, वार्ड के बाहर ही गैलरी में बैठ गए थे।

      मैं बार-बार अपने मन में यही कह रहा था, ‘ये क्या हो गया भगवान, मेरी बच्ची के साथ। उसकी रक्षा नहीं की तूने, तू सच में बहुत बड़ा निर्दयी…।’ कि सोचने लगा था…….

      ‘………चाचा एक बात कहनी थी आपसे।’ एक दिन शाम को चाय पीते समय बोली थी सुमन मुझसे।

      ‘कहो।’

      ‘ऐसे नहीं, प्यार से पूछो।’ और पीछे से मेरे गले में बाहें डाल दी थीं। छोटी थी तब, ऐसे ही किया करती थी जब चिज्जी या हप्पा मांगती थी।

      ‘प्यार, मेरे पास कहाँ है बेटा। अगर प्यार होता तो आज मेरे अपने….। ’ इसके आगे नहीं बोलने दिया था सुमन ने। और कहा था, ‘अगर आप में प्यार नहीं है तो दुनिया के किसी भी आदमी में प्यार नहीं होगा।’

      ‘अच्छा बताओ क्या बात है।’ मैंने चाय का कप प्लेट में रखते हुए कहा था।

      ‘चाचा।’

      ‘हाँ।’

      ‘चाचा।’

      ‘अरे भैया, अब चाचा से आगे भी बढ़ेगी या चाचा पर ही अटकी रहेगी। और पहले तो एक काम करो मेरे ऊपर से हटो। यहाँ बैठो आकर। कितनी बड़ी हो गई है लेकिन फिर भी बच्ची ही बनी रहती है। कोई कहेगा इसे देखकर कि ये अफसर होगी।’ मेरे प्यार में अथाह गहराई थी।

      सुमन मेरे पास ही सोफे पर बैठ गई थी। बिल्कुल मुझसे सटकर। फिर उसे चैन नहीं पड़ा तो मेरी गोद में सिर रख लिया था। ‘अब सुनो।’

      ‘मैं एक लड़के से….।’ कहाँ बोलने दिया था, मैंने उसे आगे। मैं ही बोला था, ‘प्यार करती हूँ, राईट।’

      बस गजब हो गया था। ‘आपने कैसे जाना, बताओ….बताओ…ये बात आपको किसने बताई। मम्मी तक नहीं जानती। अच्छा उसी ने बताया होगा।’ गोद से उठकर बैठ गई थी।

      ‘अरे मुझे किसी ने नहीं बताई। आखिर मैं, तेरा चाचा हूँ भाई।’  मैं बोला था।

      ‘आप चाचा नहीं हैं। आप पापा हैं, पापा…..सिर्फ पिता ही होता है जो अपने बच्चों के मन की बात जान लेता है।’ और उसकी आँखों की कोरों में गीलापन गहरा हो गया था। मैंने आँसुओं को बाहर नहीं आने दिया था। आँसू पी लेने में मुझे महारत हासिल है।

      ‘मेरे आफिस में ही है। मेरा ही बैचमेट है। मुझसे तीन नम्बर नीचे उसका नाम था। हम दोनों ने साथ-साथ ज्वाइन किया था।’ बताए जा रही थी सुमन, ‘बहुत रहीस घर का है। अकेला बेटा है अपने माँ बाप का। मुझे बहुत प्यार करता है, चाचा।’

      ‘और तुम।’

      ‘मैं भी।’ उसके इतना कहने पर मैंने उसकी ओर देखा था। फिर क्या था। ‘हम ना… मजाक बना रहे हैं मेरी।’ और फिर तो सोफे से उठकर मेरी पीठ पर लद गई थी। ‘और बनाओगे मजाक, बताओ, बताओ।’

      ‘अरे अब उतर भी। मैं बूढ़ा आदमी हूँ। अब तू बच्ची नहीं है। और आज तो साबित हो गया कि तू बच्ची नहीं है। अच्छा चल आगे बता….। ’ मैने उसे पकड़कर अपने पास फिर बैठा लिया था।

      ‘चाचा वह मुझे बहुत प्यार करता है। मैं भी। एक दिन कहने लगा मुझसे। चाचा सुनो तो।’ और मुझे झकझोरने लगी थी, ‘कि सुमन, हमारी माँ कहती हैं हमारे घर में खूब सारे बच्चे चाहिए। दो, चार, पाँच, नौ, ग्यारह।’

      तभी न जाने क्यों मुझे डॉक्टर के कहे शब्द य़ाद आने लगे थे कि अब… सुमन कभी, मां…नहीं।

      ‘क्या।’ मैं अनायास ही बोल पड़ा था।

      ‘हाँ चाचा, उसकी माँ चाहती है कि उनके घर में खूब सारे बच्चे हों। मैंने तो कह दिया, सिर्फ दो बच्चे ही करेंगे।, ठीक कहा न चाचा मैंने।’

      ‘हाँ’ मैं कब बोल गया था मुझे पता ही न चला।  होश तो तब आया जब एक महिला कर्मचारी मुझ पर चिल्लाई थी, ‘चलो, चलो भागो यहाँ से….वहाँ जाकर बैठो… ये कोई बैठने की जगह है। चलो….हटो….।’

      छोटेवाले ने कहा भी था, ‘तुम्हारा दिमाग खराब है। ऐसे बात करते हैं। मेरे चाचा बहुत बड़े अफसर हैं।’

      ‘अफसर होगा अपने आफिस में। यहाँ तो वही होगा जो हमें कहा गया है।’ उसकी बात का बुरा मैंने नहीं माना था। मैं वहाँ से उठकर चला आया था। छोटेवाला साथ-साथ था।

      दो दिन वार्ड में रखने के बाद उसकी छुट्टी हो गई थी। डॉक्टर ने फिटनेस सर्टीफिकेट दे दिया था। सुमन ने आफिस ज्वाइन कर लिया था और फिर एक सप्ताह की छुट्टी ले ली थी।

अब वह घर पर ही आराम करती थी। रोज शाम को मेरे पास आकर बैठ जाती।

      तभी एक शाम……

      ……मैं थक गया था। ऑफिस में काम ज्यादा रहा था। दरअसल एक एग्रीमेंट था इंडोनेशिया के साथ भारत का। उसी का ड्राफ्ट तैयार करते-करते सब करम हो गए थे सो बैड पर लेटा था कि सुमन आ धमकी।

      ‘और हैण्डसम, कैसे हो।’

      ‘तू बता तेरा प्यार कैसा चल रहा है।’ मैं कहाँ चूकने वाला था। शरीर ही तो थका था। मुँह थोड़े ही न थका था।

      ‘सोलिड।’

      ‘अरे तूने उस गधे का नाम तो बताया ही नहीं उस दिन।’ मैं चिढ़ाने में भी माहिर हूँ।

      ‘रणविजय सिंह।’

      ‘माने ठाकुर साहब और तू च…।’

      ‘चाचा हम नहीं। अब मैं बड़ी हो गई हूँ। और वैसे भी प्यार में जातिबंधन हैज नो मीनिंग।’ वह बोली थी। ‘चाचा आज क्या हुआ…सुनो तो….आज उसकी माँ का फोन आया था। जानते हैं आप उसकी माँ क्या कह रही थी।’ और उसने मेरे चेहरे की ओर देखा था।

      मैंने आँखें घुमाई थीं।

      ‘कह रही थी। सुमन जल्दी से घर आ जाओ दुलहिन बनकर। घर सूना-सूना लगता है। और जल्दी से तीन चार बच्चे।’

      ‘ऐं’, मैं लेटा था बैड पर सो उठकर बैठ गया था। और डॉक्टर का चेहरा मेरी आँखों में घूम गया था…सुमन अब कभी माँ…नहीं….

      सुमन नहीं समझ पायी थी। उसे लगा था कि उसके मुँहफट होने से मैं नाराज हो गया हूँ तभी तो बोली थी। ‘सॉरी, सॉरी…चाचा। गलती हो गई। आप मुझे डाँटते ही नहीं…इसीलिए…अब आगे से ध्यान रखूँगी।’

      और इतना कहकर कान पकड़कर मेरे सामने खड़ी थी। ठीक वैसे ही जैसे बचपन में कोई गलती करती और मैं डॉंटता तो, ऐसे ही खड़ी हो जाती थी। मैंने उसे सहज किया था और बोला था, ‘बेटा एक बात सुनो मेरी।’

      ‘जी, चाचाजी।’

      ‘तुम कितना प्यार करती है उस लड़के से।’

      ‘अपने आप से भी ज्यादा।’

      ‘तुम यह भी जानती हो, प्यार में झूठ बोलना, धोखा देना, अविश्वास करना प्यार को कमजोर बनाता है। प्यार में स्वाभिमान बहुत जरूरी है। घमण्ड नहीं। और स्वाभिमान तभी रहता है जब आप पूरे के पूरे ईमानदार हों। प्यार में डर नहीं होना चाहिए।’ इन बातों पर वह मुझे बड़ी गहनता से देख रही थी। ‘तुम समझ रही हो मैं क्या कहना चाह रहा हूँ।’

      ‘हाँ।’ वह बोली थी।

      ‘तो जाओ और उससे कह दो कि तुम कभी माँ नहीं बन पाओगी।’ सहज तरह से मैं कभी नहीं सकता था ये बात। दिल पर पत्थर रखकर ही तो बोला था मैं।

      और सुमन…..वह तो सचमुच पाषाण प्रतिमा सी मुझे निहारे जा रही थी।

      मैंने उसे हिलाया था। डॉक्टर की कही पूरी बात बताई थी। बहुत समझाया था।  वह कितना समझी कितना नहीं, ये तो वही जाने। हाँ जाने को हुई तो फिर मैंने उसे पुचकारते हुए कहा था, ‘बेटा, मेरी लाडो, मेरी राजकुमारी…..उसे सब बात स्पष्ट बताना। देखो अगर वह तुम्हारा होगा तो तुम्हारे पास आ जाएगा और अगर नहीं होगा तो तुमसे दूर चला जाएगा। तुम दोनों ही स्थितियों में जीत में रहोगी। कम से कम अकेले में बैठोगी तो खुद को दोष तो नहीं दोगी कि तुमने उसे छला है। किसी को भी छल लो लेकिन स्वयं से नहीं भागा जा सकता।’

      सुमन चली गई थी अपने कमरे में।

      दो दिन तक मेरे पास नहीं आई थी।

      कल आर्ई थी मेरे पास। मैंने उसकी ओर प्रश्न करने वाली आँखों से देखा था मानो कहना चाहा हो ‘क्या हुआ।’

      ‘चाचा मैंने उसे सारी बातें बताई जैसी आपने मुझसे बताई थीं।’ सुमन बताने लगी थी। उसे देखकर लगा था कि न जाने वह, कुछ ही दिनों में बहुत बड़ी हो गई हो।

      ‘फिर।’

     फिर उसने मुझसे कहा, ‘सुम्मा एक बात बताओ यही घटना हमारी शादी के बाद हुई होती तो……तो क्या मैं तुम्हें छोड़ देता।’

     ‘तब दूसरी बात होती। अभी सब कुछ तुम्हारे हाथ में है। तुम्हें दूर तक सोचना होगा।….और हाँ, माँ का कैसे करेंगे। माँ को खूब सारे बच्चे चाहिए।’ मैं निर्दयी हो गई थी।

     ‘माँ को मना लूँगा। मान जाएगी माँ। माँ बहुत अच्छी है। माँएं अच्छी होती ही हैं। तुम्हें बहुत चाहती है।’ वह बोला था ।

      ‘चाहत और यथार्थ में जमीन-आसमान का फर्क होता है। अच्छा एक काम करो….पहले खूब सोच विचार कर लो फिर देखेंगे।’ मैंने कहा था।

      ‘मुझे अकेला मत छोड़ो सुमन। मैं रह न पाऊँगा तुम्हारे बिना।’ फिर घुटनों के बल बैठ कर, दोनों हाथ बढ़ा कर, मेरी आँखों में आँखें डाल कर बोला, ‘….सुमन, तुम मेरी जिंदगी हो।’

      मैंने उसके हाथ अपने हाथों में भर लिए थे। बताए जा रही थी सुमन और मेरे गले लगकर बड़ी देर तक बिलख-बिलखकर रोती रही थी।

      और मैं उसके सिर पर प्यार से हाथ फिराता रहा था। आँखें तो गीली मेरी भी थीं कि….कि कुछ शब्द हवा में तैरने लगे थे……..कि तुम मेरी जिन्दगी हो।


लेखक के बारे में:
डॉ0 पूरन सिंह
जन्म : 10 जुलाई, 1964 (मैनपुरी. उत्तर प्रदेश)
शिक्षा : एम. ए. (अंग्रेजी-हिन्दी) ’सत्तरोत्तरी हिन्दी कहानियों में नारी’ विषय पर पी.एच.डी
.कृतियां : लगभग सभी छोटी, बड़ी और स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां, लघुकथाएं, कविताएं, लेख आदि प्रकाशित।
पुरस्कार/सम्मान : विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान और पुरस्कार।
हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा कहानी नरेशा की अम्मा उर्फ भजोरिया पर श्रीरामसेंटर दिल्ली में नाट्य मंचन का आयोजन
प्रकाशन : 6 कहानी संग्रह-पथराई आंखों के सपने, साजिश, मजबूर,पिंजड़ा, हवा का रुख और रिश्ते तथा 7 लघुकथा संग्रह – महावर, वचन, सुराही, दिदिया, इंतजार,100 लघुकथाओं का संग्रह, मन तथा 64 दलित लघुकथाएं एवं कविता संग्रह – विद्रोह, अस्तित्व प्रकाशित।
कविता संग्रह-वृंदा तथा कहानी संग्रह 18 कहानियां 18 कहानीकार तथा व्यथा का संपादन।
एक कहानी संग्रह एक कविता संग्रह और एक लघुकथा संग्रह प्रकाशनाधीन।
विभिन्न रचनाएँ पुरष्कृत एवं आकाशवाणी से प्रसारण
लघुकथाओं, कहानियों और कविताओं आदि में निरंतर लेखन
उड़िया/मराठी/पंजाबी/बंगला/उर्दू/अंग्रेजी आदि में विभिन्न रचनाओं का अनुवाद प्रकाशित।
संप्रति : वित्त मंत्रालय, भारत सरकार में प्रथम श्रेणी अधिकारी
संपर्क 240, बाबा फरीदपुरी, वेस्ट पटेल नगर,नई दिल्ली-110008 फोन : 9868846388

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