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भारत दर्शन : सांस्कृतिक यात्रा

यात्राएं न केवल हमें बाहर ले जाती हैं बल्कि अपने अंदर झांकने का अवसर भी प्रदान करती है। यह प्रसिद्ध कथाकार निर्मल वर्मा का मानना है। उन्होंने कितने ही यात्रा वृतांत लिखे। मुझे अवसर मिला भारतीय रेल की ओर से चलाई जा रही #भारत दर्शन यात्रा में चंडीगढ से रामेश्वरम्,  कन्याकुमारी,  केरल व तिरूपति बालाजी की सांस्कृतिक यात्रा करने का। कहते हैं कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक हैं। मुझे कश्मीर की यात्रा का सुअवसर तो नहीं मिला लेकिन अंतिम छोर कन्याकुमारी तक छूने का अवसर जरूर मिल गया। मोहाली में मेरे छोटे भाई की पत्नी ने हमारे टिकट बुक करवा दिए और हमारी विवशता हो गई कि यह यात्रा करें। यह इसी वर्ष 17 मार्च की बात है। बस ,दिन रात दोनों बहनों में फोन पर यात्रा की तैयारियों को लेकर चर्चा होती रहती। खैर , हम 16 मार्च को मोहाली पहुंच गये। ताकि समय पर दूसरी सुबह भारत दर्शन की रेल में सवार हो सकें।
|| कमलेश भारतीय

अभी सुबह का अंधेरा था जब हमने भाई के पड़ोसी की कार में सामान ठूंसा और चंडीगढ रेलवे स्टेशन की ओर चल पडे। प्रातः सात बजकर दस मिनट पर भारत दर्शन छह सौ अस्सी लोगों को लेकर रामेश्वरम की ओर चल पड़ी। हम बारह लोग एक समूह के थे और ऐसे ही अगले बारह लोग मलोया व चंडीगढ़ से थे। मज़ेदार बात कि अपने पराए हो गये और पराए अपने हो गये। यह यात्रा में ही होता है। सहयात्री बदल जाते हैं।

लगातार तीन दिन और तीन रात्रि रेल छुक छुक करती रही। कहीं आउटर पर खड़ी रही। इस बीच भारत दर्शन की ओर से रेल के डिब्बों में ही सुबह की फीकी मीठी चाय , गर्मागर्म परांठे,  पोहा , पकौड़े और तीनों समय का खाना परोसा जाता रहा। असल में यह भारत दर्शन रेल यात्रा करवाने के साथ ही आपके बाहर ठहरने और गाड़ी के अंदर खाने की व्यवस्था करती है। इसमें एक व्यक्ति का टिकट  11, 340 है। इसी में ये सुविधाएं शामिल हैं। माइक से लगातार चेतावनियां और जानकारियां दी जाती रहीं। सोते समय मोबाइल चार्ज नहीं करना , बाहर कुछ नहीं फेंकना , एक दूसरे की मदद करना आदि। एक प्रकार से गाइड की तरह भी कि रामेश्वरम् उतरने पर सिर्फ पचास रुपए में ऑटो हो जाता है और मंदिर दर्शन के मात्र पच्चीस रुपए का टिकट है। रामेश्वरम् के आने से पहले रेल समंदर के लगभग बीच से गुजरती है। कोई रेलिंग भी नहीं। सिर्फ रेल लाइन और विशाल समंदर। दिल धक् सा रह जाता है। तीन दिन तीन रात की लगभग पैंतीस सौ किलोमीटर की यात्रा के बाद रेल से उतरने का मौका मिला।

शाम को होटल में सोये। कुछ ने कपड़े धोने में ही फुर्सत पूरी कर ली। हम छोटे से बाज़ार में घूमने निकले। बाहर से मंदिर का भव्य द्वार देखा। माला मोती की दुकानें। फटाफट चाय की रेहड़ियां। लुंगी लगाए लोग। पानी खारा। नहाने पर बाल चिपचिपाते। शैंपू लगाकर भी चिपचिपाहट दूर नहीं हुई। होटल की तीसरी मंजिल से रात को समंदर साफ , रोशनियों में डूबा समंदर देखा। नावें। सुबह के लिए आराम जरूरी था। गाड़ी बर्थ से तीन बाद सही बैड पर नींद खूब आई।

सुबह चले रामेश्वरम् मंदिर। टिकट ली और दर्शन किए। समंदर के किनारे भी गये और फिर मंदिर में बने बाइस पवित्र कुडों के स्नान के लिए एक ब्राह्मण देवता का सहारा लेना ही पड़ा। कुंड में से बाल्टी से पानी निकाल कर लगातार स्नान होता रहा और आखिर मंदिर में ही अपनी लुंगी का पल्ला उठाकर ब्राह्मण देवता ने दक्षिणा मांगते कहा : आप लोगों के चलते ही परिवार पलता है। मैंने जल्दी से पैसे दिए और सपरिवार बाहर निकल आया। ये बाइस कुंड देश के सभी तीर्थों का पवित्र जल लिए हुए हैं।

बाहर निकलते ही एक ऑटो वाला चिपक गया तो बस चिपक ही गया। हमने कहा कि भई,  अभी नाश्ता करेंगे , होटल में गीले कपड़े बदलेंगे पर वह तो टलने को तैयार ही नहीं था। लगभग डेढ़ घंटे बाद नाश्ता पानी लेकर ऑटो में सवार हुए। लगभग बीस किलोमीटर दूर धनुष कोटी गांव की ओर। जो गांव जरूर हैं पर वहां कोई मकान नहीं बना सकता। सिर्फ पुराने खंडहर हैं। सन् 1964 में समंदर ने इसे लील लिया था। उसके बाद से यहां आबादी नहीं है। सिर्फ रामसेतु देखने जाते हैं। चिलचिलाती धूप और गर्म रेत पर चल कर कुछ फोटो लिए। आइसक्रीम खाई और चल दिए। रास्ते में विभीषण मंदिर देखा। वहां जानकारी लिखी गयी हैं कि यहीं रामचंद्र ने विभीषण का राजतिलक किया था। बाहर निकल नारियल पानी का आनंद लिया और कच्ची गिरी भी खूब खाई। मात्र बीस रुपए का नारियल जो हिसार तक आते आते चालीस का हो जाता हैं।

अंत में पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम के आवास पर ऑटो रोका। बाहर बड़े बड़े बोर्ड लगे हैं। पहली मंजिल पर म्यूजियम है। दूसरी पर मोती माला व गिफ्ट्स का शोरूम। कलाम के बड़े भाई सबसे निचली मंजिल पर रहते हैं। मिलने की इच्छा थी पर वे आराम कर रहे थे। अधूरी इच्छा से लौट आए। फिर होटल और सामान उठा कर रेलवे स्टेशन की ओर भागे।

रामेश्वरम से चल कर गाड़ी मदुरै की ओर बढ़ी। मीनाक्षी मंदिर के लिए। दूसरे दिन मदुरै में थे। फिर वही कतार। वही टिकट। वही इंतज़ार। मीनाक्षी मंदिर का शिल्प बहुत खूबसूरत है। पचास का टिकट लिया तब भीड़ से बाहर आए। कुछ खरीदारी। कुछ जानकारी। फिर प्लेटफॉर्म की ओर। यहां थोड़ी परेशानी उठानी पड़ी क्योंकि रेल को देरी हो रही थी और बच्चों को मच्छर काट रहे थे। यात्री शिकायत करने गये तब जाकर गाड़ी प्लेटफॉर्म पर लगी। यात्रा में कुछ परेशानी तो उठानी ही पड़ती है। इसके बिना भी यात्रा का क्या मज़ा ? सब मीठा मीठा थोड़े ही मिलेगा ?

तीसरा पड़ाव केरल का त्रिवेन्द्रम रहा। पहले आयुर्वेद का शान्तिगिरी आश्रम दिखाया। सफेद संगमरमर से खिलते हुए कमल की कल्पना साकार की गयी है। नाम के अनुरूप शांति। पर हमारे यात्री काजू देख कर तोड़े बिना नहीं रहे। अशांति कर ही दी।

वहां से बीच पर ले जाया गया। समंदर की लहरें किनारे पर ठाठें मारती आतीं और लौट जातीं। किनारे कश्ती और सुरक्षा कर्मचारी। लोग फिर भी लहरों से अठखेलियां करने जाते।

त्रिवेन्द्रम के पद्मनाभ मंदिर के नियमों के अनुसार सिर्फ लुंगी लगाकर ही दर्शन किए जा सकते हैं। बस से उतरते ही सब लुंगियां खरीदने में जुट गये। फिर धर्मशाला में स्नान और वही लंबी कतार। धक्के पे धक्का। जय जयकार। गर्मी। छोटे बच्चों के रोने के स्वर।

पद्मनाभ मंदिर के बाहर पांचों पांडवों की प्रतिमाएं लगी हैं। काफी बड़ी बड़ी। इनका क्या संबंध है। किसी ने नहीं बताया। त्रिवेन्द्रम् से रेल चली कन्याकुमारी की ओर। देश के अंतिम छोर। उसके बाद सिर्फ समुद्र ही समुद्र। रात के समय थके हारे पहुंचे। सुबह-सुबह सूर्योदय देखना है। पर चार बजे से उठाना शुरू किया। परिवार नहीं जागा और सूर्योदय को होना था , सो हो गया। हम वंचित रह गये। होटल के गेट पर एक बूढ़ी महिला दही बेच रही थी। जिस दिन से घर से निकले दूध दही देखा ही नहीं। चटपट दो गिलास दही खरीदकर पीया। सभी दही पर टूट पडे। शायद एक घंटे के भीतर सारा दही बिक गया। नाश्ता किया और फिर निकले कन्याकुमारी के दर्शन करने। बाजार खूब सजा भरा। प्रोफेशनल फोटोग्राफर पिंड नहीं छोड़ते। पीछे लगा लेते हैं। हार कर कुछ फोटो उनसे भी करवाए। समंदर लहराता , लहरें चट्टानों से टकरातीं। विवेकानन्द स्मारक। गांधी स्मारक। पर कोई गांधी साहित्य बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं। भारत माता की प्रतिमा भी लगी है बाहर लाॅन में। बच्चे हिम्मत करके वोट में चले गये विवेकानन्द स्मारक देखने। हम पति पत्नी हिम्मत नहीं जुटा पाए। शाम को बच्चों के साथ निकले सूर्यास्त देखने। खूब भीड़। अलग अलग राज्यों के लोग। चाय की चुस्कियां और साथ में केले के पकौड़े। आखिर सूर्यास्त हुआ। धीरे-धीरे सूर्यदेव समुद्र में चले गये। डुबकी लगा कर। आराम कर दूसरी सुबह फिर तरोताज़ा होकर आएंगे। यही मनुष्य का कर्म है। चरैवेति चरैवेति।

अब सिर्फ अंतिम पड़ाव तिरूपति बालाजी। देश का सबसे धनी मंदिर। दिव्य दर्शन के तीन सौ रुपये की टिकट। सर्वदर्शन के लिए लम्बी कतार। हाॅल में टीवी पर रामायण। लेकिन भाषा अलग। कहानी पता है तो समझ आ रही है। बीच में खिचड़ी का प्रसाद मिल जाता है। शाम छह बजे से हाॅल में और ग्यारह बजे बाद खुलते हैं द्वार। रेलिंग की भूल भूलैया में आखिरकार दर्शन। बाहर निकलते ही लड्डू का प्रसाद और हर 70 रुपए की टिकट पर चार चार बडे बडे लड्डू। हमारे पास एक दर्जन हो गये। चलो। अब बांट सकेंगे।

अब वापसी। वही तीन रात दो दिन लम्बी यात्रा।

चंडीगढ़ से चले थे तो पहले हरियाणा के स्टेशन आए। फिर दिल्ली। फिर हरियाणा , फिर राजस्थान,  मध्यप्रदेश,  फिर दक्षिण भारत। कितने राज्य और कितने दृश्य। कहीं सूखा। कहीं हरियाली। कहीं गेहूं कट चुकी , कहीं धान। नारियल के पेड़ , आम के फल , काजू , कटहल। कितना कुछ। कितनी बोलियां ? कितनी तरह के पहनावे। दक्षिण में फूलों की वेणी ही श्रृंगार है। उतर भारत में सोने का हार है। फूलों से मन भर जाए तो गहने किस काम के ?

हम बहुत सी भाषाएं नहीं जानते थे। सामने वाले भी नहीं समझते थे पर संकेत से सब समझ जाते। सच , दिल है हिंदुस्तानी। रामेश्वरम् हो या कन्याकुमारी या केरल सब कामचलाऊ हिंदी समझते हैं। पर्यटन ही कन्याकुमारी और रामेश्वरम् का मुख्य आय का साधन हैं। फिर हिंदी क्यों न समझें ? इसके बावजूद दक्षिण के किसी रेलवे स्टेशन पर हिन्दी समाचार पत्र नहीं मिला। कोई हिंदी पत्रिका भी नहीं मिली।

यह भारत दर्शन एक प्रकार से सांस्कृतिक जीवन की झलक हैं। झांकी हैं हमारे हिंदुस्तान की। हमारी बोली न भी जाने , दिल की भाषा एक हैं हमारी। जब तक हमारे सांस्कृतिक रूप से जुड़े रहेंगे , तब तक भारत कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ही रहेगा। वापसी पर रेवाड़ी ही उतर लिए और वहां से सुबह की गाड़ी से 29 मार्च को हिसार पहुंच गये। फिर किसी यात्रा की उम्मीद में।

लेखक : कमलेश भारतीय
संपर्क सूत्र: 1034 बी , अर्बन एस्टेट 2 , हिसार  125005, हरियाणा। मोबाइल: 9416047075

 

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