कला साहित्य

यात्रा संस्मरण: सीता का पीहर

पंडित घर आया और बोला-“ठाकुर! नेपाल के जनकपुर में भाई किशोर साहित्य का अन्तर्राष्ट्रीय आयोजन कर रहे हैं, आपकी इजाज़त हो तो टिकट करा लिया जाए?”

“नेकी और पूछ-पूछ, एक तो किशोर भाई का कार्यक्रम और साथ में अखिलेश पंडित, किसकी मजाल है जो मना कर दे?”

पंडित अखिलेश और डॉ. यास्मीन के साथ पोंटा साहिब की ऐतिहासिक और यादगार यात्रा मेरे यात्रा-संस्मरण का हिस्सा है। मुकेश राय के साथ अक्सर मैंने यात्राएँ की हैं, इस बार तो उनके निवास स्थान का संयोग था, तो साथ में जाना तय ही था। नेपाल यात्रा की योजना बनी। पहले हवाई जहाज से काठमांडू जाना तय हुआ, वहाँ से जनकपुर। कई बार योजनायें बनती बिगडती रही, अंततः अखिलेश, इरफ़ान, जय सिंह आर्य, मुकेश राय और मेरा साथ जाना तय हुआ। पटना के रास्ते, सीतामढ़ी से नेपाल प्रवेश की योजना फाइनल हुई, टिकट करा दिए  गए, मुझे अंदेशा था कि ऐन वक्त अखिलेश किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम का बहाना बना इस यात्रा से किनारा कर लेगा, और हुआ भी वही, इरफ़ान को दोबारा टिकट कराने पड़े।

दो हजार अट्ठारह के मार्च के सुहाने मौसम की अट्ठाईस तारीख को हम लोगों ने पटना के लिए राजधानी एक्सप्रेस से अपनी यात्रा शुरू की। साथ में जय सिंह आर्य जैसे राष्ट्र-गीतकार हों तो यात्रा का आनन्द बढ़ना स्वाभाविक होता है, अगरचे गीतकार गज़ल और लघुकथा सुनने-सुनाने का वक़्त दूसरों को भी दें। इरफ़ान एक इकोनोमिक खजांची के रूप में था। चाय, नाश्ते से लेकर डिनर तक की समस्त जिम्मेदारी उसके कंधो पर डाल सभी साहित्यिक आश्वस्त थे। रात भर के सफ़र के बाद सुबह ट्रेन पटना जंक्शन पर थी, ट्रेन से उतर हमने सीता मढ़ी के लिए बस स्टैंड का रुख किया। ट्रेन की सुबह की चाय के बाद एक-एक चाय बस स्टैंड पर भी पीकर पटना की मिठास का जायजा ले लिया था। लेख्य-मञ्जूषा की कर्ता-धर्ता विभा रानी श्रीवास्तव से फ़रवरी दो हज़ार अट्ठारह में ही दो दिनों के अन्तराल में दो मुलाकात हुई थी, पहली वायडब्ल्यूसीए, दूसरी अनिल शूर ‘आज़ाद’ के निवास पर विकासपुरी। अंजादा था कि पटना वालों में मिठास है।

पटना से बस पकड़ सीतामढ़ी का सफर तय किया, बस कहने को वातानुकूलित और एक्सप्रेस थी, जिसका किराया तो सामान्य से अधिक था लेकिन हर छोटे-छोटे गाँव से सवारी उठाती बस जब सवारियाँ ठूँसने पर उतारू हुई तो समझ में आ ही गया कि अब हम बिहार में यात्रा कर रहे हैं। यूँ तो दिल्ली की डीटीसी और मुज़फ्फरनगर जाती बसों का अच्छा-खासा अनुभव रहा है लेकिन वातानुकूलित एक्सप्रेस बस का ये अनुभव अनूठा ही था। जैसे-तैसे सीतामढ़ी पहुँच बॉर्डर पार करने के लिए रिक्शा पकड़ा, हालाकि इस पार की चौकी से उस पार की चौकी ज्यादा दूर नहीं थी लेकिन सड़क और सुरक्षा का हाल देखा तो लगा कि रिक्शा लेने का निर्णय भी उचित ही था। सुरक्षा व्यवस्था ऐसी कि लगा जो किस्से नेपाल रास्ते से आतंकवादी आने के सुनता आया हूँ उनमें लेशमात्र भी अतिशयोक्ति नहीं है। किसी ने न ही बैग चेक किया, न कोई तलाशी ही ली। मुकेश राय ने नेपाल की तरफ वाली चौकी पर नेपाली भाषा में कुछ बोला तो पास आया सुरक्षाकर्मी जिन कदमों से आया, उन्हीं कदमों से वापिस चला गया।

बॉर्डर पार करते ही करेंसी बदलने वाले दलाल पास आये, कमीशन पर करेंसी बदल दी गयी। बाद में पता चला कि नेपाल में भारतीय रुपया धड़ल्ले से चलता है लेकिन तब तक दलाल की जेब में कमीशन जा चुका था। बस अड्डे उतरकर हम लोग आयोजन स्थल पहुँचे। इरफ़ान और जय सिंह आर्य को वहाँ छोड़ हमने मुकेश के घर जाने के लिए कूच किया।

मेरा परिचय मुकेश राय की माताजी और पत्नी दोनों से था, उनके पिताजी से नहीं मिला था। भारतीय शिष्टाचार ने मुझे सिखाया है कि पहली बार किसी के घर जाओ तो खाली हाथ कभी मत जाओ, उस घर में तो कदापि नहीं जहाँ छोटे बच्चे भी हों। कार्यक्रम स्थल से रिक्शा पकडा, एक किराना स्टोर से कुछ सामान लिया, सामान की कीमत दिल्ली की कीमत से ढाई से तीन गुनी अधिक देख मैं चौंका। एक गरीब और बीमारू देश की महंगाई का आलम ये है तो जनता कैसे गुजर-बसर करती होगी। पैसा चुकता कर मैं और मुकेश राय ने घर की ओर
प्रस्थान किया।

जनकपुर हम लोग कार्यक्रम से दो दिन पहले पहुँच गए थे, अतः हमारे पास एक पूरा दिन जनकपुर घूमने के लिए काफी था। कई बार ऐसा होता है न कि ‘सिर मुंडाते ही ओले पड़ना’, ऐसा ही कुछ हुआ नेपाल पदार्पण के समय। पता चला कि टैक्सी-रिक्शा की जनकपुर में सामूहिक हड़ताल है। जैसे-तैसे मुकेश जी के किसी पडोसी ऑटो चालक से सहमति हुई कि वह विराटनगर जाने वाले रास्ते के पहाड़ तो घुमा ही देगा। ‘भूखे को क्या चाहिए दो रोटी ही न’ की तर्ज पर हमने उसके रेट पर जाना स्वीकार किया। विकल्पहीन होने पर महँगा विकल्प भी जरुरी जान पड़ता है, फिर ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा’ यूँ ही तो राहुल सांस्कृत्यायन नहीं लिख कर गए होंगे, घुमक्कड़ी और फक्कड़ी तो हममे भी कूट-कूट कर भरी है। जनकपुर यात्रा का शुभारम्भ हो चुका था। ऑटो में बैठते ही जयसिंह आर्य का नवरचित गीत उनके चिरपरिचित अन्दाज में शुरू हो गया, सबने रस लेकर श्रवण किया। ज्यों-ज्यों ऑटो चढ़ाई पर था, तापमान नीचा होता जाता था। रास्ते में रुकते, फोटो खीचते, रुक-रुककर चाय पीते और कविता पाठ करते कदम-कदम बढ़ाये जा, ख़ुशी के गीत गाये जा की तर्ज पर यात्रा जारी थी। एक बड़े ही रमणीक स्थान पर पठाव डाला तो अपने अन्दर का वीडियो बनाने का कीड़ा कुलमुलाने लगा। अपने अन्दाज में ठीक उसी तरह वीडियो बनने लगी मानो कोई न्यूज चैनल का संवाददाता किस स्थान का वर्णन करता है, ऐसी ही एक वीडियो कभी अंडमान की जेल और सबसे अधिक ऊंचाई के होटल की छत से २०१६ में सूट की थी। मेरे बोलने के अन्दाज पर जयसिंह आर्य ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की कि बिना स्क्रिप्ट के कोई कैसे इतना बढ़िया रिसाईट कर सकता है, बाकि मित्रों से भी प्रशंसा सुन मन गदगद हो गया।

Photo Credit: Sandeep Tomar

जनकपुर वह स्थान है, जहाँ राजा जनक की पुत्री सीता से जुड़ी कई कहानियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि अयोध्या नरेश दशरथ के चारों पुत्रों का विवाह मणिमंडप नाम की एक जगह पर सम्पन्न हुआ था। राम और माता जानकी का परिणय धनुष भंग के पश्चात जनकपुर में ही हुआ था। यहाँ जानकी मंदिर के पास एक विशाल मैदान है। माना जाता है कि यहाँ ही पिनाक धनुष तोड़कर श्री राम ने सीता जी से विवाह की शर्त पूर्ण की थी। रामचरित मानस में भी इसे ‘रंगभूमि’ के नाम से वर्णित किया गया है। ऐसा कहा जाता है कि जनकपुर धनुषा मंदिर में ही परशुराम और राम का मिलन हुआ था। कहते हैं कि धनुष का एक हिस्सा कहीं दूर जाकर गिरा था, जहाँ आज धनुषधाम नाम से एक मन्दिर हैं। मन्दिर में एक पेड़ के पास धनुष की काले पत्थर की आकृति है, जो लगातार बढ़ रही हैं, यह जमीन में उभरी हुई आकृति है। वहाँ की मान्यता के अनुसार हम सबने भी धनुष की आकृति की परिक्रमा की। धनुषधाम से आगे एक तालाब है जिसे परशुराम तालाब के नाम से जाना जाता है। तालाब के बीचो बीच एक कमल पर परशुराम की मूर्ति है, कथाओं में परशुराम का जिक्र एक गुस्से वाले ऋषि के रूप में है, जिन्होंने पिता की आज्ञा से अपनी माता का सिर काट दिया था, कुछ कहानियों से पता चलता है कि उन्होंने माता के क्षत्रिय होने के चलते पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने की असफल प्रतिज्ञा भी की, सत्रह बार असफल प्रयास भी किये, शायद ये किस्सा ही कल्पित हो, लेकिन परशुराम को हस्तिनापुर के महान पुरोधा द्रोणाचार्य, भीष्म और कर्ण के गुरु के रूप में इतिहास में जाना जाता है।

जनकपुर में मणि मंडप में मणियों से सजी हुई वेदी और यज्ञ मंडप है। हालाकि, अब यह सिर्फ नाम तक ही सीमित है। जनकपुर में कई ऐसे स्थान हैं, जहाँ सीता-विवाह से जुड़े कई स्थान हैं और जब भी आस-पास के इलाके में शादी होती है तो इन स्थान से सामान खरीदे जाते हैं, जैसे किसी जगह से बांस खरीदे जाते हैं। इसके अलावा एक जगह है, जिसका नाम है रत्न सागर, कहते हैं यहाँ सीता की शादी का दहेज रखा गया था और इसमें काफी रत्न इत्यादि धन था। एक जगह है, जहाँ शादी के बाद चारों दूल्हा और दुल्हन जल-क्रीडा के लिए आए थे, इस जगह को विहार कुंड कहा जाता है।

जानकी मंदिर, धनुषधाम और परशुराम मन्दिर जनकपुर की शान हैं। जनकपुर में राम-जानकी के कई मंदिर हैं। इनमें सबसे भव्य मंदिर का निर्माण भारत के टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुमारी बुंदेला ने करवाया। पुत्र प्राप्ति की कामना से महारानी वृषभानु कुमारी बुंदेला ने अयोध्या में ‘कनक भवन मंदिर’ का निर्माण करवाया, परन्तु पुत्र प्राप्त न होने पर गुरु की आज्ञा से पुत्र प्राप्ति के लिए जनकपुरी में १८९६ ई. में जानकी मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर निर्माण प्रारंभ के एक वर्ष के अंदर ही वृषभानु कुमारी को पुत्र प्राप्त हुआ। जानकी मंदिर के निर्माण हेतु नौ लाख रुपए का संकल्प किया गया था। फलस्वरूप उसे ‘नौलखा मंदिर’ भी कहते हैं। परन्तु इसके निर्माण में १८ लाख रुपया खर्च हुआ। जानकी मंदिर के निर्माण काल में ही वृषभानु कुमारी के निधनोपरांत उनकी बहन नरेंद्र कुमारी ने मंदिर का निर्माण कार्य पूरा करवाया। बाद में वृषभानु कुमारी के पति ने नरेंद्र कुमारी से विवाह कर लिया। जानकी मंदिर का निर्माण १२ वर्षों में हुआ लेकिन इसमें मूर्ति स्थापना १८१४ में ही कर दी गई और पूजा प्रारम्भ हो गई। जानकी मंदिर को दान में बहुत-सी भूमि दी गई है जो इसकी आमदनी का प्रमुख स्रोत है। जानकी मंदिर परिसर के भीतर प्रमुख मंदिर के पीछे जानकी मंदिर उत्तर की ओर ‘अखंड कीर्तन भवन’ है जिसमें १९६१ ई. से लगातार सीताराम नाम का कीर्तन हो रहा है। जानकी मंदिर के बाहरी परिसर में लक्ष्णण मंदिर है जिसका निर्माण जानकी मंदिर के निर्माण से पहले का बताया जाता है। परिसर के भीतर ही राम जानकी विवाह मंडप है। मंडप के खंभों और दूसरी जगहों को मिलाकर कुल १०८ प्रतिमाएँ हैं।

विवाह मंडप (धनुषा) में विवाह पंचमी के दिन पूरी रीति-रिवाज से राम-जानकी का विवाह किया जाता है। जनकपुरी से १४ किलोमीटर ‘उत्तर धनुषा’ नामक स्थान है। बताया जाता है कि रामचंद्र जी ने इसी जगह पर धनुष तोड़ा था। पत्थर के टुकड़े को अवशेष कहा जाता है। पूरे वर्षभर ख़ासकर ‘विवाह पंचमी’ के अवसर पर तीर्थयात्रियों का तांता लगा रहता है।

जनकपुर में कई अन्य मंदिर और तालाब हैं। प्रत्येक तालाब के साथ अलग-अलग कहानियाँ हैं। ‘विहार कुंड’ नाम के तालाब के पास ३०-४० मंदिर हैं। यहाँ एक संस्कृत विद्यालय तथा विश्वविद्यालय भी है। विद्यालय में छात्रों को रहने तथा भोजन की निःशुल्क व्यवस्था है। यह विद्यालय ‘ज्ञान कूप’ के नाम से जाना जाता है। जनकपुर में अनेक कुंड हैं यथा- रत्ना सागर, अनुराग सरोवर, सीताकुंड इत्यादि। उनमें सर्वप्रमुख है प्रथम अर्थात रत्नासागर जो जानकी मंदिर से करीब 9 किलोमीटर दूर ‘धनुखा’ में स्थित है। कहा जाता है कि वहाँ प्रत्येक पच्चीस-तीस वर्षों पर धनुष की एक विशाल आकृति बनती है जो आठ-दस दिनों तक दिखाई देती है, मंदिर से कुछ दूर ‘दूधमती’ नदी के बारे में कहा जाता है कि जोती हुई भूमि
के कुंड से उत्पन्न शिशु सीता को दूध पिलाने के उद्देश्य से कामधेनु ने जो धारा बहायी, उसने उक्त नदी का रूप धारण कर लिया।

तीस व इकत्तीस मार्च को साहित्यिक कार्यक्रम था। ये एक अनोखा अंतरराष्ट्रीय मैत्री सम्मेलन था। सम्बन्धों की परिभाषा से परे नेपाल-भारत के अन्त: सम्बन्ध की अक्षुण्णता को निरंतरता देने के लिए “हम सब साथ-साथ” संस्था का छठा सोशल मीडिया मैत्री सम्मान समारोह तथा अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन नेपाल-भारत मैत्री विराङ्गना फाउंडेशन काठमाडौं एवं भारतीय राजदूतावास काठमाडौं के संयुक्त तत्वाधान जनकपुर में सुखद वातावरण में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र में विशिष्ट साहित्यकारों का परिचय हुआ। विभिन्न विधाओं के प्रतिभागियों का परिचय करवाते हुये उन्हें प्रतिभागी का बैच पहनाकर और प्रतीक स्वरुप भाई-चारे का दुपट्टा ओढ़ाकर सम्मानित किया।

किशोर श्रीवास्तव, अंजलि पटेल और जया श्रीवास्तव ने सुमधुर कंठ से दोनों देशों के राष्ट्रगान और कार्यक्रम का टाईटिल सांग “इन्सान का इन्सान से हो भाई चारा यही पैग़ाम हमारा” का गायन करके सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था। हर प्रतिभागी के होंठ इन पंक्तियों को गुनगुना रहे थे। उसके पश्चात कार्यक्रम से जुड़े नेपाल व राजदूतावास के विशेष अतिथियों को मंचासीन कर दीप प्रज्ज्वलन करके उनके सम्मान व उदबोधन से कार्यक्रम का विधिवत शुभांरभ हुआ।

दोनों देशों के बीच प्रागैतिहासिक काल से अटूट-अजर-अमर सम्बन्ध में सौहार्द्रता सहाशयता तथा स्नेहिल वातावरण में यह दो दिवसीय कार्यक्रम जनकपुर स्थित यात्री निवास के प्रांगण में सम्पन्नता पूर्वक आयोजित हुआ, जिसमें सभी का सकारात्मक एवं प्रशंसनीय योगदान था।

 उक्त कार्यक्रम में उद्घाटन सत्र के प्रमुख अतिथि प्रदेश न. 2 के माननीय मंत्री जितेंद्र सोनल, मंत्री ज्ञानेन्द्र यादव तथा विशिष्ट अतिथि डी. सी. एम, साथ ही भारतीय राजदूतावास काठमाडौ के डॉ. अजय कुमार, महावाणिज्य दूतावास, वीरगंज के वी.सी.प्रधान, वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद के ई.शालिग्राम सिंह, नेपाल भारत मैत्री संघ, राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार सिंधी, नेपाल भारत ग्रन्थालय के महेशचन्द्र शर्मा एवं अतिथि राजेश्वर नेपाली, राष्ट्रीय जनता पार्टी प्रवक्ता रामभरोसे कापड़ी, सवैला मेयर विजयशंकर प्रसाद साह, जनकपुर उपमहानगरपालिका की उपमेयर रेणु झा, शत्रुघन कुँवर, जितेंद्र कुमार, सीताराम अग्रहरी आदि उपस्थित थे। हालाकि मंच पर नेपाल के वरिष्ट साहित्यकारों की अनुपस्थिति अवश्य ही खली, जबकि नेपाल में राजेन्द्र विमल, पुष्पराज, महेंद्र मिश्र जैसे साहित्यकार हैं, जिनकी उपस्थिति साहित्य के इतिहास को अवश्य ही गौरवान्वित करती।

तीस मार्च की शाम नेपाल के भूतपूर्व सांसद और नज्मकार श्री महेंद्र मिश्र जी से चाय की थड़ी पर लम्बी वार्ता हुई, किसी सांसद का चाय की थड़ी पर मेरे साहित्यिक मित्रों के साथ वार्ता करने अवश्य ही विस्मयकारी हो सकता है, मिश्र जी ने वार्तालाप के बाद पान खिलाने की पेशकस की, जिसे किसी भी मित्र ने नहीं टाला। पान की दुकान पर भी साहित्यिक चर्चा चलती रही, पान की मिठास और नेपाल का साहित्यिक आतिथ्य मंत्रमुग्ध करने के लिए पर्याप्त
था। महेंद्र मिश्र जी के साथ 31 की शाम आयोजित कार्यक्रम से इतर एक मंत्रणा कार्यक्रम की रूपरेखा बनी, जिसमें भारत और जनकपुर में उपलब्ध नेपाल के चुनिन्दा साहित्यकारों की उपस्थिति पर विचार बना।

नियोजित कार्यक्रम में पहले ही दिन शशि श्रीवास्तव की बाल पुस्तक “नन्हें क़दम ऊंची उड़ान” और “हम सब साथ साथ” पत्रिका के नए अंक का विमोचन किया गया। मेरी भी एक पुस्तक “एक अपाहिज की डायरी” का लोकार्पण इस भव्य कार्यक्रम में हुआ।

दूसरा सत्र था “सोशल मीडिया से मिले खट्टे-मीठे अनुभव” चयनित प्रतिभागियों ने इस अवधि में अपने-अपने अनुभव सुनाए। मध्याह्न भोजन के बाद आनन्दित पल थे, संयोजक श्री किशोर श्रीवास्तव ने अपने चिरपरिचित अन्दाज में मस्ती से भरा संचालन किया। जिम्नास्टिक, मयूरी डांस, भरतनाट्यम, गीत-संगीत, बाँसुरी, तबला, हारमोनियम, वादन, सब कुछ रोचक था,
मनोरंजक था, कला के किसी क्षेत्र को नहीं छोड़ा गया, श्रोता समुंदर में डूब-उतर रहे थे, सब कुछ आनंदित और भाव-विभोर करने वाला था। निशांत के बाद भी श्रोता नहीं ऊबते लेकिन समय सीमा का अनुशासन भी महत्व रखता है, पूर्व नियोजित “अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन” का समय हुआ तो नेपाल-भारत से चयनित कवियों ने अपनी कविताओं के रस में सबको भिगोकर रोमांचित कर दिया। अनुशासन के मामले में बढिया मंच संचालन हुआ। रात भर चलने वाले इस कवि सम्मलेन के बाद नींद के आग़ोश में आयोजक और प्रतिभागी आए। प्रथम दिन का अवसान, यानी 30 मार्च 2018 के कार्यक्रम समाप्ति।

31 मार्च 2018 द्वितीय दिवस का कार्यक्रम सुबह के नाश्ते के बाद शुरू हुआ। “बेटियों की दशा-दिशा” पर “खुला मंच” परिचर्चा आयोजित हुई। बिजनौर से रश्मि अग्रवाल ने अपने संतुलित विचार रखे, तो मैंने अपनी चर्चित लघुकथा “दूसरी बेटी का बाप” की रचना-प्रक्रिया पर चर्चा की, श्रोताओं की डिमांड पर रचना भी सुनाई। जिसका जिक्र सुभाष चंदर ने भी अपने वक्तव्य में किया। ये मेरे लिए रोमांचित पल था कि व्यंग्य के इतने बड़े हस्ताक्षर दूसरी बेटी का बाप और उसके लेखक से प्रभावित हैं, इस रचना का जिक्र आगे भी उनके मुख से कई कार्यक्रमों में मैं सुनता रहा। हालाकि कार्यक्रम में समय-सीमा का बंधन होने से बहुत से प्रतिभागियों के दिल का दर्द बह नहीं सका लेकिन जितने प्रतिभागी बोले, बहुत अच्छा बोले और यही किसी कार्यक्रम की सफलता की सार्थकता की द्योतक होती है। दूसरे सत्र के “बहुभाषीय कवि सम्मेलन” की उद्घोशिका ज्योति स्पर्श थी, जिसके मंच संचालन ने सबको खासा प्रभावित किया। पहली बार किसी संचालक को एक स्थान पर खड़े होकर संचालन न करते देख मंच को कवर करने की अदायगी देखी, उन्होंने कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए। शेर-ओ-शायरी के साथ नए कवि-शायर को आवा  देने का उनका अन्दाज काबिलेतारीफ रहा, उनके संचालन को देखकर लगा कि वे कोई सामान्य कवयित्री न होकर अवश्य ही पत्रकारिता के क्षेत्र से हैं, यह बात बाद में पुख्ता भी हुई। आंचलिक क्षेत्रीय भाषा में कविता सुनना, अलौकिक अनुभूति से भर देता है- मानों मिट्टी की सुगंध हृदय में सुवासित करती हो।

मध्याह्न भोजन के बाद चयनित प्रतिभागी और सहयोगकर्त्ताओं को प्रमाणपत्र और स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया। ग्रुप फ़ोटोग्राफी का दौर भी काफी लम्बा चला। किशोर श्रीवास्तव, अंजलि पटेल और जया श्रीवास्तव ने सुमधुर कंठ के साथ “ज़िन्दगी प्यार का गीत है इसे हर दिल को गाना पड़ेगा” गया, हर प्रतिभागी उनके साथ गा रहा था।

शाम को मेरे द्वारा तय किये गए कार्यक्रम में भारत की ओर से किशोर श्रीवास्तव, सुभाष चंदर, राजेन्द्र जैन राजन, विभा श्रीवास्तव, ज्योति स्पर्श, और स्वयं मैं प्रतिधित्व कर रहे थे, नेपाल से महेंद्र मिश्र, मुकेश कुमार राय, महेश सहित अन्य साथी थे। चाय पर चर्चा का यह अनूठा विचार-मंथन था, जिसमें कुछ साहित्यिक आदान-प्रदान के साथ निर्णय लिए गए। उसी की कड़ी में बाद में लघुकथा पटना कार्यक्रम में महिंद्र मिश्र को मुख्य अतिथि बुला विभा रानी श्रीवास्तव ने इस विचार गोष्ठी को अमली जमा पहनाया। बाद में भारत के कुछ लघुकथाकारों की रचनाओं का नेपाली अनुवाद भी इसकी सार्थकता को सिद्ध करना का अगला कदम था। इस विचार गोष्ठी के बाद स्वयं किशोर श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य में इसका श्रेय मुझे देते हुए कहा-“नेपाल कार्यक्रम में ये मीटिंग मील का पत्थर है और दो दिवसीय कार्यक्रम से ज्यादा महत्वपूर्ण ये मीटिंग है, जिसका सारा श्रेय श्री संदीप तोमर और महेंद्र मिश्र जी को जाता है।

कार्यक्रम के बाद अगला दिन घूमने-घुमाने का रहा। सीतामढ़ी व जनकपुर में माँ जानकी और काठमांडु में बाबा पशुपतिनाथ जैसे अनेकों प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन करने से प्रतिभागियों की यह यात्रा साहित्यिक, सांस्कृतिक व धार्मिक बनी, साथ ही नेपाल की प्राकृतिक और मनमोहक वादियो, पर्वत श्रंखलाओं ने इस यात्रा को यादगार बना दिया। इस आयोजन ने हर एक प्रतिभागी
के दिल पर एक अमिट छाप छोड़ी, जिसे वह वर्षो-वर्ष नहीं भूल पायेगा।

पाँच साल पहली नेपाल की इस रोचक यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण पहलु हैं- पहला, वहाँ के कवि और पूर्व सांसद महेन्द्र मिश्र जी के साथ चौराहे के पास थड़ी पर बैठकर चाय पीना और फिर पान के खोखे पर जाकर पान खाना। बरबस ही मुझे भारत के नेताओ की याद आयी। उनका व्यवहार भारतीय राजनीतिक और यहाँ के राजनेताओं की वीआइपी संस्कृति को आइना दिखा रहा था। हमारे नेतागण इतने वीआईपी कल्चर में जीते हैं कि सांसद क्या आपको विधायक, पार्षद तक बड़ी और लग्जरी गाड़ी में जखीरे से साथ मिलेंगे। सभी के साथ सिक्योरिटी होगी, जनता के सेवक जनता से ही डरे हुए। दूसरी महत्वपूर्ण बात – इनसे कोई पूछे कि आपका रोजगार क्या है, तो उनके पास जवाब नहीं होगा। रोजगार छोड़कर ही तो राजनीति करते हैं। राजनीती से बड़ा रोजगार इनके लिए कुछ है ही नहीं।

पहली बार कोई पार्षद या विधायक बनता है तो आम जनता के साथ रहता है कुछ ही दिनों में उसका मकान कोठी में बदल जाता है, और वह साधारण कॉलोनी से निकल पॉश कॉलोनी का निवासी हो जाता है। जिन सड़क के गड्ढों की राजनीती उसे सत्ता तक पहुँचाती है, वे गड्ढे भी नेताजी की रोजगार विहीन आय की तरह बढ़ते जाते हैं।

एक वाकया पढ़ा -लगा कि उक्त विषय के लिहाज से प्रासंगिक है—

एक बार वियतनाम के राष्ट्रपति हो-ची-मिन्ह भारत आए। भारतीय मंत्रियों के साथ हुई मीटिंग के दौरान उन्होंने पूछा “आप लोग क्या करते हैं?”

मंत्रियों ने जवाब दिया- “हम लोग राजनीति करते हैं।”

उनकी समझ में उत्तर नहीं आया तो उन्होंने अपना सवाल दोहराया- “मेरा मतलब, आप लोगों का पेशा क्या है?” मंत्रियों ने कहा- “राजनीति ही हमारा पेशा है।”

हो-ची मिन्ह थोड़ा झुंझलाए, उन्होंने कहा- “शायद आपलोग मेरा मतलब नहीं समझ रहे। राजनीति तो मैं भी करता हूँ; लेकिन मैं पेशे से मैं किसान हूँ, खेती करता हूँ। खेती से मेरी आजीविका चलती है। सुबह-शाम मैं अपने खेतों में काम करता हूँ। दिन में राष्ट्रपति के रूप में देश के लिए अपना दायित्व निभाता हूँ।”

भारतीय प्रतिनिधिमंडल निरुत्तर था। उनके पास हो-ची मिन्ह की बात का कोई जवाब नहीं था। जब हो-ची-मिन्ह ने दोबारा वही-वही बातें पूछी तो प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने झेंपते हुए कहा -“राजनीति करना ही हम सबों का पेशा है।”

वास्तव में राजनीति ही इनका पेशा है। चुनाव में टिकट खरीदने से लेकर चुनावी खर्च इनका व्यापारिक इन्वेस्टमेंट है, चुनाव जीतने के बाद ये व्यापारिक लाभ लेना शुरू करते हैं। पार्षदों और विधायकों की सबसे मोटी कमाई बिल्डर्स से शुरू होती है, ये पटरी रेहड़ी वालो तक से हफ्ता वसूली के लिए अपने एजेंट छोड़ते हैं, रिक्शा, और अन्य सवारी वाहनों से भी वसूली की जाती है। कर्मचारियों के मनचाही जगह पर स्थानान्तरण में ये मोटी रकम लेते हैं। फल विक्रेता से भी मासिक भुगतान पाते हैं। चिकन मटन बेचने वाले भी इनकी कमाई का जरिया बनते हैं। मूल रूप से अधिकांश भारतीय जनप्रतिनिधियों को आप रोजगार-विहीन ही पाएंगे।

नेपाल यात्रा का दूसरा बड़ा पहलु था- मुकेश कुमार राय के परिवार के साथ गुजरा वक़्त, उनत्तीस मार्च को दोपहर बाद उनके घर पहुँच गए, जाते ही गरमागरम चाय ने सारी थकान उतार दी, सुजाता भाभी जहाँ अद्वितीय सुन्दरी हैं वहीँ बोलचाल, व्यवहार में अति साधारण। अल्पायु, तीन बेटियां, सास-ससुर, यानी भरा-पूरा परिवार, ऊपर से बेहद संतुलित। आगंतुक की मेजबानी, जिसका नाश्ता, मध्यान भोजन, चाय, शाम का भोजन, रात्रि में हल्दी दूध, सब नियत समय पर; 30 मार्च की सुबह मुकेश राय की माताजी की तबियत अचानक बिगड़ जाने से उन्हें आकस्मिक चिकित्सा के लिए अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। अचानक परिवार की व्यस्तता बढ़ गयी तथापि मुकेश और उनकी पत्नी ने आतिथ्य धर्म का पूर्णत: निर्वहन किया।

तीसरा बड़ा पहलु था- नेपाल की मिटटी की खुशबू, मिट्टी-पानी की वह गंध जो मुझे अहसास दिलाती रही, कुछ तो कनेक्शन है इस मिटटी से मेरा। किसी से इसी कार्यक्रम में मुलाकात हुई, पाया कि वही महक, वही माटी की खुशबू इस अजनबी को करीब पाकर भी महसूस की। मन से आवाज उठी-“ये अजनबी लड़की जिसकी महक के सपने मुझे यदाकदा आते रहे; आज इस जगह, इस रूप में, इस मोड़ पर? मैंने उस अजनबी लड़की को कहा-“तुम्हें पुनर्जन्म पर विश्वास है? मैं तुम्हें करीब पा एक महक, एक कसक, एक पहचानी सी खुशबू महसूस कर रहा हूँ, पता नहीं ऐसा क्यूँ हो रहा है? मैं खुद इससे आश्चर्यचकित हूँ।

उसने कहा-“आपसे मिलकर मुझे भी लगा कि ये पहली मुलाकात नहीं, कहीं तो कभी तो मिले हैं, किसी जन्म में तो मिले हैं।“

नेपाल से वापसी हो गयी लेकिन यह जो पहली बार मिलकर अहसास हुआ कि पहले भी कहीं मिलें हैं, यह अहसास आज पाँच साल बाद भी उतना ही अनसुलझा है जितना उस पल था।


लेखक सन्दीप तोमर

 

परिचय :

सन्दीप तोमर
जन्म: जून 1975
जन्म स्थान: खतौली (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा: स्नातकोत्तर (गणित, समाजशास्त्र, भूगोल), एम.फिल. (शिक्षाशास्त्र) पी.एच.डी. शोधरत
सम्प्रति: अध्यापन
साहित्य: 4 कविता संग्रह , 4 उपन्यास, 2 कहानी संग्रह , एक लघुकथा संग्रह, एक आलेख संग्रह सहित आत्मकथा प्रकाशित।पत्र-पत्रिकाओं में सतत लेखन।

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