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दिल्ली दंगे: कभी ना मिटने वाला भाई-चारा और अब गम

मौजपुर चौक की वो जगह, जहां से 23 फरवरी को कपिल मिश्रा ने पुलिस की मौजूदगी में अल्टीमेटम दिया था, ”ट्रंप के जाने तक तो हम जा रहे हैं, लेकिन उसके बाद हम आपकी भी नहीं सुनेंगे. अगर रास्ते खाली नहीं हुए, उसके बाद हमें लौटकर आना पड़ेगा.” इसके अलावा हिन्दू सेना का अल्टिमेटम की रविवार तक रास्ता नहीं खुला तो हम खुलवा लेंगे।
Anjan K Samal

ये कुछ ऐसे ब्यान है जो अपने आप मे हिंसा की पूरी कहानी कहते है। कपिल मिश्रा का वो ब्यान जो उन्होने दिल्ली पुलिस के एक बड़े अधिकारी के सामने दिया था। अगर उस ब्यान को दिल्ली पुलिस उस समय गंभीरता से ले लेती तो शायद आज दिल्ली मे भाई चारा कायम रहता। बात सिर्फ कपिल मिश्रा की ही नहीं है। दिल्ली चुनाव के दौरान बीजेपी के कुछ नेताओ ने जाम कर धार्मिक नारो का प्रयोग किया। एक विशेष समुदाय के लोगो को टार्गेट करके भाषण देना सिर्फ चुनावी प्रचार का हिस्सा तो नहीं माना जा सकता। ये एक नेता के मानसिक स्थिति को दर्शाता है। बीजेपी ने हिन्दुत्व को आगे रख कर चुनाव मे धर्म के नाम पर वोट की राजनीति को हवा दी। जिसका परिणाम दिल्ली मे फैलती हिंसा रही। प्रवेश वर्मा के वो नारा “देश के गद्दारो को, गोली मारो … को” भी कहीं न कहीं दिल्ली दंगो का कारण बना। दंगो तक दिल्ली की मानसिक स्थिति ऐसी कर दी गई की माहौल बिगड़ता ही चला गया। यह दंगा उस समय हुआ जब दुनिया के सबसे ताकतवर देश के सबसे ताकतवर व्यक्ति ट्रम्प भारत दौरे पर थे।

दिल्ली दंगो मे हिंसा की बड़ी भयानक तस्वीरे सामने आई है। इन दंगो मे इंसानियत की सभी हदे पार की गई। दंगो का दंश झेल चुके लोग जब आप बीती बता रहे है तब दंगो की भयावक्ता सामने आ रही है।

कैसे शुरू हुये दंगे

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध में दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में पिछले कई दिनों से प्रदर्शन चल रहे थे.

शाहीन बाग़ के अलावा जाफ़राबाद, करदमपुरी, चांद बाग़, खजूरी ख़ास, वजीराबाद और यमुना विहार इलाक़े में भी लोग जमा होकर विरोध जता रहे थे.

शनिवार-रविवार, 23 Feb की रात को जाफ़राबाद में प्रदर्शन कर रहे लोग सर्विस लेन से हटकर मेट्रो स्टेशन के नीचे बैठ गए. माहौल उस समय ज्यादा खराब हुये जब पूर्व विधायक और बीजेपी नेता कपिल मिश्रा नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में कुछ लोगों को साथ लेकर जाफ़राबाद से लगभग एक किलोमीटर दूर मौजपुर की तरफ़ बैठ गए.

इसके बाद सीएए समर्थकों और विरोध कर रहे लोगों में झड़प की ख़बरें आईं. दोनों पक्षों की ओर से नारे लगाते हुए रिकॉर्ड वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किए जाने लगे.

सोमवार, 24 फरवरी से माहौल ओर ख़राब होना शुरू हुआ, जब सुबह मौजपुर चौक पर कुछ लोग नागरिकता क़ानून के समर्थन में बैठ गए. इसके बाद कबीर नगर इलाके में नागरिकता क़ानून के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए. 10 बजे के करीब मौजपुर चौक और कबीर नगर में जमा लोगों के बीच पथराव होने लगा. यह सिलसिला दिन में एक बजे तक चलता रहा.

पत्थरबाजी के बीच जाफ़राबाद, गोकुलपुरी और भजनपुरा में घरों और धार्मिक स्थलों पर भी हमला किया गया। खराब होते हालातो के बीच गोकुलपुरी में हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल गोली और पत्थर लगने से घायल हुए जिनकी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई. और डीसीपी शाहदरा अमित शर्मा घायल हुए.

जब धार्मिक नरो से गूँजा दिल्ली

हिंसा के बीच  ‘जय श्री राम’ और ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे किसी के लिए भी एक दहशत से कम नहीं थे। ये नारे सुन कर लोग अपने घरो मे दुबकने के लिए मजबूर थे और एक नारो की आड़ मे दहशत सड़कों पर घूम रही थी।

पीएम की शांति अपील

इन पूरे दंगो के बीच कोई जनता का नेता जनता से संवाद करने सामने नहीं आया। आम लोगो की यही शिकायत रही की अगर कोई बड़ा नेता, कोई संसद, विधायक अपनी जनता के बीच पहुँच कर उन्हे समझता को शायद दंगा फैलने से बच सकता था।

दंगे शुरू होने के लगभग 3 दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने शांति की अपील की। उन्होंने ट्वीट करके लिखा,”दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में हालात का विस्तार से जायज़ा लिया. पुलिस और एजेंसियां जल्द से जल्द हालात पर काबू पाने के लिए काम कर रही हैं.”

पीएम ने लिखा, “शांति और सौहार्द हमारी मूल भावना है. मैं दिल्ली के भाइयों और बहनों से हर समय शांति और भाईचारा बनाए रखने की अपील करता हूं. ये बेहद ज़रूरी है कि जल्द से जल्द हालात सामान्य हों और शांति स्थापित हो.”

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गृहमंत्री अमित शाह का इस्तीफ़ा मांगा. उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि दिल्ली में हुई हिंसा ‘सोची-समझी साज़िश’ का परिणाम है.

सवालो के घेरे मे दिल्ली पुलिस

दिल्ली मे दंगे जितनी तेजी से भड़के उसने सभी को आचार्य मे डाल दिया। JNU, जामिया के स्टूडेंट्स पर लाठी चार्ज कर चुकी पुलिस इन हिंसा के आरंभ मे शांत नज़र आई। दिल्ली पुलिस पर दंगो मे सही समय पर सही कार्यवाही नहीं करने के आरोप भी लगे जिसे पुलिस ने खारिज कर दिया। कई ऐसे विडियो सामने आए जिसमे दिल्ली पुलिस कुछ दंगाइयो का साथ देती नज़र आई। दंगाइयो पुलिस के सामने पत्थर फेक रहे थे ओर पुलिस मूक दर्शक बनी थी।

दिल्ली पुलिस की बर्बरता का विडियो बहुत वाइरल हुआ, जिसमे दिल्ली पुलिस के जवान 4 लड़को को सड़क पर गिरा कर मार रहे है और उनसे राष्ट्रगान गाने को बोल रहे है। उनमे से एक लड़के की मौत हो चुकी है। उसके परिवार ने पुलिस पर भेदभाव और जानबूझ कर मारने के आरोप लगाए है।

इसके अलावा ऐसे भी विडियो सोश्ल मीडिया मे सामने आए है जिसमे पुलिस खुद दंगाइयो को पथरबाजी के लिए निर्देश देती नज़र आई है। हम इन विडियो की पुष्टि नहीं करते है।

दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि पुलिस ने प्रोफ़ेशनल ढंग से काम नहीं किया. कार्रवाई के लिए किसी के आदेश के इंतज़ार की ज़रूरत नहीं है.

हाई कोर्ट के हस्तक्षेप से रुकी हिंसा?

धर्म के आग में जलती दिल्ली को ठंडा करने की शुरुआत सबसे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने की।

दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस एस मुरलीधर और जस्टिस अनूप भंबानी ने देर रात को दिल्ली हिंसा और पीड़ितों के ज़रूरी इलाज से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई की.

मानवाधिकार मामलों की वकील सुरूर मंदर के द्वारा दाखिल की गई इस याचिका की सुनवाई जस्टिस एस मुरलीधर के आवास पर हुई थी.

सुरूर मंदर ने अपनी याचिका में कोर्ट से दरख़ास्त की थी कि दिल्ली पुलिस ये सुनिश्चित करे कि मुस्तफ़ाबाद के अल-हिंद अस्पताल से घायलों को जीटीबी अस्पताल और दूसरे सरकारी अस्पतालों में ले जाया जा सके ताकि उन्हें ज़रूरी इलाज़ मिल सके.

जस्टिस मुरलीधर ने देर रात लगभग 12:30 पर इस मामले की सुनवाई की.

इसके बाद दिल्ली हिंसा मामले में अगले दिन हाई कोर्ट में जस्टिस एस. मुरलीधर और जस्टिस तलवंत सिंह की बेंच ने एक और याचिका पर सुनवाई की.

ये याचिका सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने दायर की थी जिसमें नेताओं के भड़काऊ भाषणों पर पुलिस एक्शन की मांग की गई थी.

सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने भड़काऊ भाषणों के मामले में कपिल मिश्रा समेत बीजेपी के दूसरे नेताओं के ख़िलाफ़ एक्शन ना लेने पर दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई.

हाई कोर्ट ने कहा कि बीजेपी के तीन नेताओं अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा और कपिल मिश्रा पर एफ़आईआर दर्ज होनी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि अन्य वीडियो के आधार पर भी एफ़आईआर दर्ज की जाए.

इसके बाद जस्टिस मुरलीधर का तत्काल प्रभाव से हरियाणा हाइ कोर्ट मे ट्रान्सफर कर दिया गया।

क्या पुलिस रोक सकती थी दंगे?

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुये कहा था की दिल्ली पुलिस ने अपना काम प्रॉफेश्नल तरीके से नहीं किया। कुछ काम के लिए पुलिस को किसी के आदेश की जरूरत नहीं होती। सर्वोच्च अदालत की ये टिप्पणी उस समय बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है जब दिल्ली पुलिस संदेह की नज़र से देखा जा रहा था।

“1984: The Anti Sikh Riots and After” किताब लिखने वाले संजय सूरी ने बीबीसी से कहा है की दिल्ली में हो रही हिंसा में भी पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े हुए हैं. दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस की सुस्त कार्रवाई पर नाराज़गी जताई है.

अदालत ने कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर जैसे नेताओं के भड़काऊ बयानों पर एफ़आईआर न करने, सोशल मीडिया पर हिंसा से जुड़े वीडियो की जांच न करने और बचाव के लिए फ़ौरी कदम न उठाने पर दिल्ली पुलिस को जमकर लताड़ लगाई है.

इसके अलावा 1984 के दंगों को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार राहुल बेदी भी पुलिस की निष्क्रियता को एक बड़ी समानता बताते हैं. बीबीसी की एक खबर के अनुसार उन्होने बताया की, “पुलिस के दंगों में शामिल होने का मतलब हमेशा ये नहीं होता कि वो ख़ुद दंगाइयों के साथ मिलकर मारकाट करने लग जाए. पुलिस के दंगों में शामिल होने का मतलब होता है उसका अपराधियों को शह देना. उन पर कार्रवाई न करना और हिंसा की खुली छूट देना. पुलिस के दंगे में शामिल होने का मतलब है दंगाइयों को इम्युनिटी देना, उनकी रक्षा करना.”

अब भी सोशल मीडिया पर ऐसे कई बयान आए हैं, जिनमें पुलिस मूकदर्शक सी बनी दिख रही है. कई पीड़ितों और चश्मदीदों ने पुलिस पर त्वरित कार्रवाई न करने का आरोप लगाया है.

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